यूँ जाओ ना ऐसे तुम तड़पता छोड़कर मुझ को

तुम्हारे बा'द रख देगी ये दुनिया तोड़कर मुझ को

अभी ख़ुशियों के सांचे में ढला ही था कि ये दुनिया
ग़मों की आँच देकर रख दिया है निचोड़कर मुझ को

तराशा क्यूँ इसे तुम ने के जब पारा ही करना था
क्यूँ तोड़ा है बताओ तुम ने ऐसे जोड़कर मुझ को

के अब शर्दी की ये रातों को वो कैसे गुज़ारेगी
जो सोती थी कभी कंबल की तरह ओढ़कर मुझ को

ज़माना हो गया बिछड़े, तमाशा देखिए "आलम"
वो हंस देती है तन्हाई में अब भी सोच कर मुझ को

— maqbul alam

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