Parveen Sultana Saba

Parveen Sultana Saba

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Parveen Sultana Saba shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Parveen Sultana Saba's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
वो मिरा मौजों से लड़ लड़ कर उभर कर देखना
दोस्तों का दूर साहिल से समुंदर देखना

हम कई सदियाँ तुम्हारे नाम पर लिख जाएँगे
तुम भी इक लम्हा हमारे नाम लिख कर देखना

हो सदफ़ की चाह तो तह में उतरना शर्त है
क्या किनारों पर खड़े यूँ रेत पत्थर देखना

मर-मिटे हो जिस के तुम चश्म-ओ-लब-ओ-रुख़सार पर
उस बुत-ए-काफ़िर के बातिन का भी मंज़र देखना

कैसा तूफ़ान-ए-हवादिस क्या तलातुम क्या भँवर
देख लो उन सब को तुम फिर मेरे तेवर देखना

सर निगूँ साहिल से टकरा कर पलटती मौज के
वलवले चाहो तो फिर तूफ़ाँ में रह कर देखना

गर्दिश-ए-सय्यारगाँ क़िस्मत बताती है अगर
काम फिर किस का है तारों का मुक़द्दर देखना

है 'सबा' हर रात की तक़दीर में नूर-ए-सहर
रौशनी देखेगा अपना भी मुक़द्दर देखना
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Parveen Sultana Saba
हुस्न की इक चिंगारी ने क्या ख़ूब लगाई इश्क़ की आग
रुख़ पर ज़ुल्फ़ का झोंका आया और लहराई इश्क़ की आग

आँख से निकली इक दस्तक ने दिल दरवाज़ा खोल दिया
प्यार का इक गुलदस्ता थामे मिलने आई इश्क़ की आग

साथ में जीना साथ में मरना रिश्ता अपनी सदियों का
हम-जोली हो अपनी जैसे या माँ-जाई इश्क़ की आग

पैर में चक्कर हाथ में कासा दिल वालों की बस्ती में
प्यार की दौलत लेने निकले हाथ में आई इश्क़ की आग

हिज्र के तपते सहरा में इक याद के घूँट से दम आया
बिल्कुल जान निकलने को थी जब पहुँचाई इश्क़ की आग

उस ज़ालिम की नज़रों में कुछ जादू जैसी बात तो थी
पहले प्यार का रूप सजाया फिर सुलगाई इश्क़ की आग

हिज्र के हाथों दिल की ज़मीं पर नाग-फनी जब काश्त हुए
हम ने याद की कलियाँ सूंघीं और महकाई इश्क़ की आग

दुनिया भर की नहरें दरिया और समुंदर सूख गए
सोहनी अपने कच्चे घड़े में जब भर लाई इश्क़ की आग

यूँ तो 'सबा' हम हर मौसम में आग में ज़िंदा जलते हैं
सावन की रुत ने लेकिन खुल कर बरसाई इश्क़ की आग
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जब नया मोड़ लेने को थी ज़िंदगी वक़्त ने इक नई दास्ताँ बख़्श दी
नाम उन का मिरे दिल पे कंदा किया यूँ मुझे ज़िंदगी जावेदाँ बख़्श दी

उस की नज़रों ने कुछ ऐसा जादू किया ताक़चों में दिए झिलमिलाने लगे
इक दिया जल उठा हुजरा-ए-क़ल्ब में जिस ने उल्फ़त को सौत-ए-अज़ाँ बख़्श दी

मेरी आँखें मिरे कान मेरी ज़बाँ हाकिम-ए-वक़्त ने रेहन में रख लिए
हाथ पैरों को कटवा दिया बाद में पर ये एहसाँ किया मेरी जाँ बख़्श दी

हुस्न को दी अदा इश्क़ को दी वफ़ा इस तरह से मुसावात क़ाएम हुई
जिन से क़ाएम मुसावात हो न सकी उन को इक फ़िक्र-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ बख़्श दी

दौलत-ए-इश्क़ की थीं फ़रावानियाँ हिज्र का माल खुल कर ख़रीदा गया
मेरी पलकों पे रौशन सितारे किए इस तरह से मुझे कहकशाँ बख़्श दी

ख़ाक को ख़ाक करना ही मक़्सद था जब किस लिए फिर ज़मीं पर ख़लीफ़ा किया
नेकियों के लिए कम मलाएक न थे हम को ये ज़िम्मेदारी कहाँ बख़्श दी

ऐ 'सबा' हम तो गूँगी रेआया में थे ज़ुल्म के सामने लब हिलाते न थे
बोलना आ गया हम को हक़ के लिए उस ने जब से क़लम को ज़बाँ बख़्श दी
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