Qaisar Shameem

Qaisar Shameem

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Qaisar Shameem shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qaisar Shameem's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कितने आशिक़ सँभल गए हैं मेरा फ़साना सुन सुन कर मेरे हक़ में जैसी भी हो काम की है नाकामी भी — Qaisar Shameem
किसी मंज़िल में भी हासिल न हुआ दिल को क़रार ज़िन्दगी ख़्वाहिश-ए-नाकाम ही करते गुज़री — Qaisar Shameem

Ghazal

शिकस्ता ख़्वाब के मलबे में ढूँढ़ता क्या है खंडर खंडर है यहाँ धूल के सिवा क्या है नज़र की धुँद में हैं भूली-बिसरी तस्वीरें पलट के देखने वाले ये देखना क्या है अभी तो काट रही है हर एक साँस की धार अज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है तुझे पसंद कहाँ हाल पूछना मेरा तिरी निगाह में लेकिन सवाल सा क्या है धुआँ नहीं न सही आग तो नज़र आए यूँँ चुपके चुपके सुलगने से फ़ाएदा क्या है उदास रात की ख़ामोशियों में ऐ 'क़ैसर' क़रीब आती हुई दूर की सदा क्या है — Qaisar Shameem
कहाँ है कोई ख़ुदा का ख़ुदा के बंदों में घिरा हुआ हूँ अभी तक अना के बंदों में न कोई सम्त मुक़र्रर न कोई जा-ए-क़रार है इंतिशार का आलम हवा के बंदों में वो कौन है जो नहीं अपनी मस्लहत का ग़ुलाम कहाँ है बू-ए-वफ़ा अब वफ़ा के बंदों में ख़ुदा करे कि समाअ'त से मैं रहूँ महरूम कभी जो ज़िक्र हो मेरा रिया के बंदों में सज़ाएँ मेरी तरह हँस के झेलने वाला नहीं है कोई भी अहद-ए-सज़ा के बंदों में ना आफ़ियत की सहर है न इम्बिसात की शाम हूँ एक उम्र से सहरा बला के बंदों में सुख़न शनास है कितना ये पूछ लूँ 'क़ैसर' नज़र वो आए जो हर्फ़-ओ-नवा के बंदों में — Qaisar Shameem
मौसम तो बदलते हैं लेकिन क्या गर्म हवा क्या सर्द हवा ऐ दोस्त हमारे आँगन में रहती है हमेशा ज़र्द हवा सब अपने शनासा छोड़ गए रस्ते में हमें ग़ैरों की तरह चेहरे पे हमारे डाल गई ला कर ये कहाँ की गर्द हवा छूटे न कभी फूलों का नगर कोशिश तो यही है अपनी मगर इक रोज़ उड़ा ले जाएगी पत्तों की तरह बे-दर्द हवा क्या बात हुई क्यूँँ शहर जला अब इस के सिवा कुछ याद नहीं इक फ़र्द सरापा आग हुआ पल-भर में हुआ इक फ़र्द हवा आई है घने जंगल में अभी जो खेल भी चाहे खेले मगर कल मेरे साथ उड़ाएगी फिर सहरा सहरा गर्द हवा आँखों की चमक मौहूम हुई लौ देते बदन अफ़्सुर्दा हुए दर आई है 'क़ैसर' घर में मिरे ये कैसी रुतों की सर्द हवा — Qaisar Shameem
थोड़ी सी शोहरत भी मिली है थोड़ी सी बदनामी भी मेरी सीरत में ऐ 'क़ैसर' ख़ूबी भी है ख़ामी भी कितने आशिक़ सँभल गए हैं मेरा फ़साना सुन सुन कर मेरे हक़ में जैसी भी हो काम की है नाकामी भी महफ़िल महफ़िल ज़िक्र हमारा सोच समझ के कर वाइज़ अपने मुख़ालिफ़ भी हैं कितने और हैं कितने हामी भी ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी यूँँ तो सुकूँ के लम्हे 'क़ैसर' होते हैं अनमोल बहुत लेकिन अपने काम आती है दिल की बे-आरामी भी — Qaisar Shameem
वो जो सब का बहुत चहीता था क़ब्र की साअ'तों में तन्हा था जिस ने दुनिया को ख़ूब देखा था उस की आँखों में क़हक़हा सा था रंज क्या ख़्वाब के बिखरने का कुछ न था रेत का घरौंदा था उस के आँगन में रौशनी थी मगर घर के अंदर बड़ा अँधेरा था वो भी पथरा के रह गया आख़िर उस की आँखों में जो सवेरा था एक पिंजरा उदास तन्हाई उस ने क्या क्या ख़ुदा से माँगा था शाख़ झुलसी हुई थी और उस पर एक सहमा हुआ परिंदा था क़हक़हों की बरात निकली थी दर्द की चीख़ कौन सुनता था पुल न था और सामने उस के एक तूफ़ाँ-ब-दोश दरिया था एक ख़ुशबू का बाँटने वाला गंदी बस्ती का रहने वाला था दुख में आख़िर ये खुल गया 'क़ैसर' नाम इक मस्लहत का रिश्ता था — Qaisar Shameem