Qamar Rais Bahraichi

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Qamar Rais Bahraichi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Qamar Rais Bahraichi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुम कैसे भुला पाओगे भाई की मोहब्बत दीवार उठा लेना तो आसान बहुत है — Qamar Rais Bahraichi

Ghazal

चाहता जैसा हूँ वैसा नहीं होने देता आइना मुझ को अकेला नहीं होने देता एक रिश्ता है बहुत दिन से तआ'क़ुब में मिरे मेरा साया मुझे तन्हा नहीं होने देता पर्दा-ए-शब से निकलने का नहीं लेता नाम आज सूरज ही सवेरा नहीं होने देता इसी इक बूँद में ख़ुद डूब न जाए वो कहीं एक क़तरे को जो दरिया नहीं होने देता ये रवय्या है बहर-हाल मोहब्बत की दलील ज़ख़्म देता है तो गहरा नहीं होने देता बाल-ओ-पर मुझ को मुयस्सर तो किए हैं उस ने इस तबीअत को परिंदा नहीं होने देता रोज़ मिलता है 'क़मर' टूट के मुझ से लेकिन अपने अंदर कोई दर वा नहीं होने देता — Qamar Rais Bahraichi
हर दर पे अपने सर को झुकाए हुए हैं लोग अपना वक़ार ख़ुद ही गिराए हुए हैं लोग आईना बन के शहर में आए हुए हैं लोग ख़ंजर भी आस्तीं में छुपाए हुए हैं लोग पूछो न अपने शहर की तहज़ीब का चलन इज़्ज़त किसी तरह से बचाए हुए हैं लोग इक जश्न-ए-इंक़लाब मनाने के वास्ते मक़्तल हर एक घर को बनाए हुए हैं लोग दिल में कुदूरतें हैं मगर देखिए जनाब इक दूसरे से हाथ मिलाए हुए हैं लोग आता नहीं ज़बाँ पे कभी उन के उस का नाम क्या जाने दिल में किस को बसाए हुए हैं लोग सहरा-नवर्द कोई नहीं है 'क़मर-रईस’ वीरान शहर-ए-गुल को बनाए हुए हैं लोग — Qamar Rais Bahraichi
बस तिश्नगी थी गहरे समुंदर में कुछ न था उस के सिवा हमारे मुक़द्दर में कुछ न था कुछ इश्क़ की नज़र ने तिरा काम कर दिया वर्ना कमाल हुस्न के पैकर में कुछ न था सब कुछ लुटा दिया था तिरी राह में फ़क़त ईमान के अलावा मिरे घर में कुछ न था रस्ते की ठोकरों से वो मंज़िल को पा गया कैसे कहूँ कि राह के पत्थर में कुछ न था दर्द-ओ-अलम मिला न ख़ुशी ही हुई नसीब शायद मिरी वफ़ा के मुक़द्दर में कुछ न था रोया तमाम उम्र वो शबनम के साथ साथ फिर क्यूँ कहूँ कि दर्द-ए-गुल-ए-तर में कुछ न था सुनते थे भाई भाई का दुश्मन है पर 'क़मर' देखा तो ऐसा शहर-ए-सितमगर में कुछ न था — Qamar Rais Bahraichi
हालात अब सँवरने के आसार भी नहीं ग़म बे-शुमार हैं कोई ग़म-ख़्वार भी नहीं क्या क्या लिखूँ मैं शहर-ए-सितम की रिवायतें इक दूसरे का कोई मदद-गार भी नहीं कश्ती का मेरी यारो निगहबाँ है कोई और हाथों में मेरे इस लिए पतवार भी नहीं किस के क़दम को चूमूँ किसे पारसा कहूँ हर शख़्स अब तो साहिब-ए-किरदार भी नहीं ऐ शैख़ तेरी बात अजीब-ओ-ग़रीब है भीगे हैं होंट और गुनाहगार भी नहीं मैं कैसे मान लूँ वो मसीहा-ए-वक़्त है किरदार उस का लाएक़-ए-दस्तार भी नहीं उस के लिए दुआएँ न माँगी कहाँ कहाँ लेकिन 'क़मर' वो मेरा तलबगार भी नहीं — Qamar Rais Bahraichi
पल भर का भरोसा नहीं सामान बहुत है ये सोच के दिल मेरा परेशान बहुत है शोहरत की ज़माने में तमन्ना न करो तुम अख़्लाक़ ही इंसान की पहचान बहुत है तुम कैसे भुला पाओगे भाई की मोहब्बत दीवार उठा लेना तो आसान बहुत है उड़ जाएँगे इक रोज़ ये ले कर के क़फ़स भी मज़लूम परिंदों में अभी जान बहुत है जिस सम्त भी जाओगे तुम्हें प्यार मिलेगा नफ़रत का मिरे शहर में फ़ुक़्दान बहुत है तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त हमें विर्से में मिली और अज्दाद का हम लोगों पे एहसान बहुत है हर हाल में रक्खा हमें ख़ुश-हाल जहाँ में अल्लह का 'क़मर' हम पे ये एहसान बहुत है — Qamar Rais Bahraichi
दिल को सुकूँ है चैन है राहत उसी से है शिकवा भी है उसी से मोहब्बत उसी से है वर्ना मिरे वजूद का कोई न था वजूद पैहम बदन में मेरे हरारत उसी से है दिल उस का आइने की तरह ख़ुश-मिज़ाज है बाक़ी जहान-ए-नौ में उख़ुव्वत उसी से है उस ने जुनूँ को मेरे जवाँ-साल कर दिया वाबस्ता मेरी आज भी शोहरत उसी से है माना कि संग मुझ को समझता है वो मगर मेरी तमाम शहर में इज़्ज़त उसी से है उस की नवाज़िशों का रहा सिलसिला दराज़ ये काएनात-ए-दिल भी तो जन्नत उसी से है उस ने मिरे क़लम को हैं बख़्शीं रवानियाँ मज़मून में भी मेरे सलासत उसी से है — Qamar Rais Bahraichi
रुका न ग़म का जो सैल-ए-रवाँ तो क्या होगा उठा बदन से अगरचे धुआँ तो क्या होगा दयार-ए-इश्क़ में आने को आ तो जाऊँ मगर मिला न आप का नाम-ओ-निशाँ तो क्या होगा उतर रहे हैं फ़लक से हयात के जुगनू जुनूँ में ढल गए वहम-ओ-गुमाँ तो क्या होगा लिबास-ए-नौ में है गुलशन का हर शजर लेकिन अगर ख़िज़ाँ ने लिया इम्तिहाँ तो क्या होगा ज़बाँ पे पहरा ख़िरद ने लगा दिया है मगर लहू ने दे दिया अपना बयाँ तो क्या होगा बदन को आइना तुम ने बना लिया तो क्या किसी ने खोल दी अपनी ज़बाँ तो क्या होगा अभी निहाँ है हर इक ज़ख़्म-ए-दिल लहू में 'क़मर' महक उठा जो ये ज़ख़्म-ए-निहाँ तो क्या होगा — Qamar Rais Bahraichi