दिल को सुकूँ है चैन है राहत उसी से है

शिकवा भी है उसी से मोहब्बत उसी से है

वर्ना मिरे वजूद का कोई न था वजूद
पैहम बदन में मेरे हरारत उसी से है

दिल उस का आइने की तरह ख़ुश-मिज़ाज है
बाक़ी जहान-ए-नौ में उख़ुव्वत उसी से है

उस ने जुनूँ को मेरे जवाँ-साल कर दिया
वाबस्ता मेरी आज भी शोहरत उसी से है

माना कि संग मुझ को समझता है वो मगर
मेरी तमाम शहर में इज़्ज़त उसी से है

उस की नवाज़िशों का रहा सिलसिला दराज़
ये काएनात-ए-दिल भी तो जन्नत उसी से है

उस ने मिरे क़लम को हैं बख़्शीं रवानियाँ
मज़मून में भी मेरे सलासत उसी से है

— Qamar Rais Bahraichi

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Garmi Shayari

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