har dar pe apne sar ko jhuk | हर दर पे अपने सर को झुकाए हुए हैं लोग

  - Qamar Rais Bahraichi

हर दर पे अपने सर को झुकाए हुए हैं लोग
अपना वक़ार ख़ुद ही गिराए हुए हैं लोग

आईना बन के शहर में आए हुए हैं लोग
ख़ंजर भी आस्तीं में छुपाए हुए हैं लोग

पूछो न अपने शहर की तहज़ीब का चलन
इज़्ज़त किसी तरह से बचाए हुए हैं लोग

इक जश्न-ए-इंक़लाब मनाने के वास्ते
मक़्तल हर एक घर को बनाए हुए हैं लोग

दिल में कुदूरतें हैं मगर देखिए जनाब
इक दूसरे से हाथ मिलाए हुए हैं लोग

आता नहीं ज़बाँ पे कभी उन के उस का नाम
क्या जाने दिल में किस को बसाए हुए हैं लोग

सहरा-नवर्द कोई नहीं है 'क़मर-रईस’
वीरान शहर-ए-गुल को बनाए हुए हैं लोग

  - Qamar Rais Bahraichi

Aabroo Shayari

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