कैसी चली हवा कि घटा ग़म की छा गई
रौशन था इक चराग़ मोहब्बत बुझा गई
क्या जाने उस के दर पे क्यूँ इतना सुकून था
वहशत के बावजूद मुझे नींद आ गई
मुद्दत से अपने आप में बिखरा हुआ था मैं
दुनिया मिरे वजूद में कैसे समा गई
अपनों के दरमियाँ भी घुटन से लगी मुझे
रिश्तों की जुस्तुजू ये कहाँ ले के आ गई
जब तक कि सर हमारा रहा रौशनी रही
नेज़े पे उस के बा'द उदासी सी छा गई
कल तक तो एहतिजाज तुम्हारे लहू में था
यारो ये कैसे दुनिया तुम्हें रास आ गई
हैरत से देखती रही मुझ को ज़मीं 'क़मर'
मिट्टी को मेरी अर्श पे ले कर हवा गई
— Qamar Rais Bahraichi















