chahta jaisa hooñ waisa nahin hone deta | चाहता जैसा हूँ वैसा नहीं होने देता

  - Qamar Rais Bahraichi

चाहता जैसा हूँ वैसा नहीं होने देता
आइना मुझ को अकेला नहीं होने देता

एक रिश्ता है बहुत दिन से तआ'क़ुब में मिरे
मेरा साया मुझे तन्हा नहीं होने देता

पर्दा-ए-शब से निकलने का नहीं लेता नाम
आज सूरज ही सवेरा नहीं होने देता

इसी इक बूँद में ख़ुद डूब न जाए वो कहीं
एक क़तरे को जो दरिया नहीं होने देता

ये रवय्या है बहर-हाल मोहब्बत की दलील
ज़ख़्म देता है तो गहरा नहीं होने देता

बाल-ओ-पर मुझ को मुयस्सर तो किए हैं उस ने
इस तबीअत को परिंदा नहीं होने देता

रोज़ मिलता है 'क़मर' टूट के मुझ से लेकिन
अपने अंदर कोई दर वा नहीं होने देता

  - Qamar Rais Bahraichi

Alone Shayari

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