बस तिश्नगी थी गहरे समुंदर में कुछ न था

उस के सिवा हमारे मुक़द्दर में कुछ न था

कुछ इश्क़ की नज़र ने तिरा काम कर दिया
वर्ना कमाल हुस्न के पैकर में कुछ न था

सब कुछ लुटा दिया था तिरी राह में फ़क़त
ईमान के अलावा मिरे घर में कुछ न था

रस्ते की ठोकरों से वो मंज़िल को पा गया
कैसे कहूँ कि राह के पत्थर में कुछ न था

दर्द-ओ-अलम मिला न ख़ुशी ही हुई नसीब
शायद मिरी वफ़ा के मुक़द्दर में कुछ न था

रोया तमाम उम्र वो शबनम के साथ साथ
फिर क्यूँ कहूँ कि दर्द-ए-गुल-ए-तर में कुछ न था

सुनते थे भाई भाई का दुश्मन है पर 'क़मर'
देखा तो ऐसा शहर-ए-सितमगर में कुछ न था

— Qamar Rais Bahraichi

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