Raja Singh 'Kaabil'

Raja Singh 'Kaabil'

@rajasinghkaabil

Raja Singh 'Kaabil' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Raja Singh 'Kaabil''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

यकायक वक़्त कुछ ऐसा मेरे हिस्से में आया है लगाऊँ मैं अगर फाँसी तो रस्सी टूट जाएगी — Raja Singh 'Kaabil'
कर रहा था मैं मरने की तैयारियाँ और फिर एक दिन सब सही हो गया — Raja Singh 'Kaabil'
कहाँ मशहूर होते आज ये क़िस्से अगर मजनूँ को लैला मिल गई होती — Raja Singh 'Kaabil'
तुम रखो बंदूक़ मेरे सर पे लेकिन मैं सनम लव यूँ तुम्हें कह कर रहूँगा — Raja Singh 'Kaabil'
याद मुझ को उस ने इतना कर लिया हिचकियों से साँस मेरी रुक गई — Raja Singh 'Kaabil'
रंग तेरे गाल पर जब से लगाया है ये हमारे हाथ तब से कँपकँपाते हैं — Raja Singh 'Kaabil'
एक ख़त आधा मुझे तू ने दिया है एक ख़त आधा तुझे में भी लिखूँगा — Raja Singh 'Kaabil'
हजारों की गड्डी पड़ी थीं मगर मुझे एक सिक्के की ख़्वाहिश रही — Raja Singh 'Kaabil'
जीभ जैसे है पहुँचती एक हिलते दाँत पर उस तरह ही याद मुझ तक है पहुँच जाती तेरी — Raja Singh 'Kaabil'
हम ने पहली मोहब्बत भी पाई नहीं आख़िरी इश्क़ भी अब गया हाथ से — Raja Singh 'Kaabil'
फरवरी क्या साल के बारह महीनों में याद आती हो मुझे तुम याद आती हो — Raja Singh 'Kaabil'
ये कमीने वक़्त पर वापस नहीं देते दोस्तों को तुम कभी पैसे नहीं देना — Raja Singh 'Kaabil'
इश्क़ का क़ानून पढ़ने में लगा हूँ आशिक़ों के केस सारे मैं लड़ूँगा — Raja Singh 'Kaabil'
इत्तेफ़ाकन जब कभी उस सेे मिलूँगा बे-झिझक में गाल उस के चूम लूँगा — Raja Singh 'Kaabil'
ख़्वाब में भी हाथ जो तू ने लगाया यार उस दिन मैं हक़ीक़त में मरूँगा — Raja Singh 'Kaabil'
तुझे पाकर यूँँ लगता है कि जैसे आठ वर्षों बा'द किसी ने खोद कर के क़ब्र से बाहर निकाला है — Raja Singh 'Kaabil'
'मुनव्वर' जा चुके हो तुम हमें क्यूँ अलविदा कह कर यहाँ माँ के लिए अब शे'र बोलो कौन लिक्खेगा — Raja Singh 'Kaabil'

Ghazal

धड़कता ही नहीं है अब हमारा दिल उसे कहना अभी भी जी रहा है पर तेरा "काबिल" उसे कहना निखारी है बहुत अच्छे से मेरी शा'इरी उस ने नहीं सजती है मेरे बिन कोई महफ़िल उसे कहना बहुत मज़बूत मैं ने कर लिया है धोखे खा खा कर नहीं टूटेगा अब ख़ंजर से भी ये दिल उसे कहना बिना मतलब ही डरते थे हम उस सेे दूर होने से नहीं है उस के बिन ये ज़िन्दगी मुश्किल उसे कहना समय से नींद आ जाती है हम को कुछ दिनों से अब नहीं करते सितारे रात में झिलमिल उसे कहना हमारे साथ था जब तक भरे थे उस के बिल हम ने नया महबूब भरता है हमारे बिल उसे कहना कहीं गर वो दिखे तुम को तो बस ये काम कर देना मरा तो ख़ुद हूँ मैं लेकिन मेरा क़ातिल उसे कहना नया महबूब उस को मिल गया है तुम सेे भी अच्छा बहुत अच्छे से रहता है तेरा "काबिल" उसे कहना — Raja Singh 'Kaabil'
जहाँ से भी गुज़रती हो वहीं ख़ुशबू उड़ाती हो छिड़कती हो बदन पर इत्र या इस सेे नहाती हो तुम्हें आता नहीं शायद सलीक़ा बात करने का ख़ुशी की बात पर आँसू ग़मों में मुस्कुराती हो तुम्हारे फोन पर डीपी लगी है यार ये किस की मुझे तुम देखते ही जो इसे पीछे छुपाती हो तुम्हारा दिल मेरे हाथों से गिरकर टूट कर बिखरा दिया है दोष ख़ुद को और मुझे अच्छा बताती हो मुझे लगता है इन हाथों को आदत हो गई मेरी तभी तो ग़ैर के हाथों को तुम झट से हटाती हो मज़ा आने लगा है अब तुम्हें दिल के तमाशे में तभी तो ये तमाशा रोज़ सड़कों पर दिखाती हो मुझे जैसे इशारे से बुलाया एक कमरे में इसी जादू से बोलो रोज़ कितनों को बुलाती हो — Raja Singh 'Kaabil'
तुम्हारे नाम पर करनी लड़ाई छोड़ दी मैं ने तुम्हारे बा'द में सारी पढ़ाई छोड़ दी मैं ने उसे इक उम्र तक तो मैं ने अपने साथ में रक्खा मगर फिर एक दिन तेरी जुदाई छोड़ दी मैं ने वो मेरे हाथ को पकड़े किसी खाई में लटकी थी शरारत में मगर उस की कलाई छोड़ दी मैं ने हमारी परवरिश का तुम पता इस सेे लगा लेना बड़ों को देखते ही चार पाई छोड़ दी मैं ने जुलाई के महीने ने मेरा महबूब छीना था गिने जब भी महीने तो जुलाई छोड़ दी मैं ने लबों को चूम सकता था मैं लेकिन गाल चू में थे पिया हो दूध जैसे और मलाई छोड़ दी मैं ने — Raja Singh 'Kaabil'

Nazm

"तुम्हारा नाम लेने से" तुम्हें अपनी परेशानी अभी मैं कह नहीं सकता तुम्हें दिल में रखूँगा तो मैं ज़िन्दा रह नहीं सकता मुझे मालूम है इक दौर था जब चाहती थीं तुम मुझे अपनी दु'आओं में हमेशा माँगती थीं तुम मगर अब क्या कहूँ तुम सेे मेरा दिल कितना रोता है तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है तुम्हारे नाम से अब फूल भी मुरझाने लगते हैं तुम्हारे ज़िक्र से आँखों में आँसू आने लगते हैं तुम्हें अब फूल कोई तोड़ कर मैं दे नहीं सकता तुम्हारा नाम मैं अपनी ज़बाँ से ले नहीं सकता तुम्हें लिखता है ख़त फिर दिल उसे ख़ूँ में भिगोता है तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है लगा है रोग कोई या तुम्हारी बद-दुआ है ये समझ में कुछ नहीं आता कि मुझ को क्या हुआ है ये निशाँ अपने मेरे दिल से मिटा दो आज तुम जानाँ मुझे क्यूँ दर्द होता है बता दो राज़ तुम जानाँ तुम्हारे दाग़ों को ये दिल बहुत मुश्किल से धोता है तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है करूँँगा एक दिन ऐसा मैं सारे ख़त बहा दूँगा कहानी बे-वफ़ाई की समुंदर को सुना दूँगा पड़ेगा फिर तुम्हें मालूम कैसे रह रहा हूँ मैं सभी सच है जो इस कविता में तुम सेे कह रहा हूँ मैं कभी रातों में जगता है कभी दिल दिन में सोता है तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है — Raja Singh 'Kaabil'
“अजब सादा सा लड़का था” अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था उसे ग़म भी थे लेकिन वो सदा हँसता ही रहता था किसी के साथ भी जाऊँ कभी रोका नहीं उस ने उसे मैं दोष जो भी दूँ कभी टोका नहीं उस ने सदा बस प्यार की बातें किया करता था वो मुझ सेे मेरे कपड़े हटा कर तिल कभी देखा नहीं उस ने बहुत इज़्ज़त मुझे देता अदब से बात करता था बयाँ मैं कर नहीं सकती वो मुझ पे कितना मरता था मुझे वो एक माँ जैसे सलीक़े सब सिखाता था दुपट्टा इस तरह ओढ़ो मुझे ये भी बताता था शरारत में अगर होता मेरी चीज़ें छुपा देता अगर मैं रूठने लगती मुझे सीने लगा लेता मेरे बालों को सुलझा कर मेरी चोटी बनाता था किसी दादी के जैसे वो कहानी भी सुनाता था अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था — Raja Singh 'Kaabil'