तुम्हारे नाम पर करनी लड़ाई छोड़ दी मैं ने
तुम्हारे बा'द में सारी पढ़ाई छोड़ दी मैं ने
उसे इक उम्र तक तो मैं ने अपने साथ में रक्खा
मगर फिर एक दिन तेरी जुदाई छोड़ दी मैं ने
वो मेरे हाथ को पकड़े किसी खाई में लटकी थी
शरारत में मगर उस की कलाई छोड़ दी मैं ने
हमारी परवरिश का तुम पता इस से लगा लेना
बड़ों को देखते ही चार पाई छोड़ दी मैं ने
जुलाई के महीने ने मेरा महबूब छीना था
गिने जब भी महीने तो जुलाई छोड़ दी मैं ने
लबों को चूम सकता था मैं लेकिन गाल चू
में थे
पिया हो दूध जैसे और मलाई छोड़ दी मैं ने
— Raja Singh 'Kaabil'















