"तुम्हारा नाम लेने से"

तुम्हें अपनी परेशानी अभी मैं कह नहीं सकता
तुम्हें दिल में रखूँगा तो मैं ज़िन्दा रह नहीं सकता
मुझे मालूम है इक दौर था जब चाहती थीं तुम
मुझे अपनी दु'आओं में हमेशा माँगती थीं तुम
मगर अब क्या कहूँ तुम से मेरा दिल कितना रोता है
तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है

तुम्हारे नाम से अब फूल भी मुरझाने लगते हैं
तुम्हारे ज़िक्र से आँखों में आँसू आने लगते हैं
तुम्हें अब फूल कोई तोड़ कर मैं दे नहीं सकता
तुम्हारा नाम मैं अपनी ज़बाँ से ले नहीं सकता
तुम्हें लिखता है ख़त फिर दिल उसे ख़ूँ में भिगोता है
तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है

लगा है रोग कोई या तुम्हारी बद-दुआ है ये
समझ में कुछ नहीं आता कि मुझ को क्या हुआ है ये
निशाँ अपने मेरे दिल से मिटा दो आज तुम जानाँ
मुझे क्यूँ दर्द होता है बता दो राज़ तुम जानाँ
तुम्हारे दाग़ों को ये दिल बहुत मुश्किल से धोता है
तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है

करूँगा एक दिन ऐसा मैं सारे ख़त बहा दूँगा
कहानी बे-वफ़ाई की समुंदर को सुना दूँगा
पड़ेगा फिर तुम्हें मालूम कैसे रह रहा हूँ मैं
सभी सच है जो इस कविता में तुम से कह रहा हूँ मैं
कभी रातों में जगता है कभी दिल दिन में सोता है
तुम्हारा नाम लेने से गले में दर्द होता है

— Raja Singh 'Kaabil'

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