कौन मेरी क़ब्र पर आँसू बहाता है

कौन मुझ को रोज़ भीगा छोड़ जाता है

मैं कई दिन से इसी उलझन में हूँ यारो
कौन मेरे फूल से ख़ुशबू चुराता है

ठीक है हम पुल बनाएँगे मोहब्बत का
ध्यान रखना बोझ से पुल टूट जाता है

वो तभी अपनी निगाहें फेर है लेती
देखने में जब मुझे आनन्द आता है

मैं तुम्हारे गाल को भी छू नहीं सकता
वो तुम्हारे होंट से उँगली लगाता है

आग लग जाती है जिस के नाम से मुझ में
वो मुझे उस की सभी ख़ूबी गिनाता है

मैं उसे ख़त भेजता हूँ अश्क से लिख कर
वो बना कर नाव पानी में बहाता है

— Raja Singh 'Kaabil'

More by Raja Singh 'Kaabil'

Other ghazal from the same pen

See all from Raja Singh 'Kaabil' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling