देखते रहना जहाँ भर से निकाले जाएँगे
हम किसी दिन अपने ही घर से निकाले जाएँगे
कुछ ख़ज़ाने को तराशा है लिबासों में मगर
कुछ ख़ज़ाने दिल के अंदर से निकाले जाएँगे
नूर बरसेगा किसी दिन धूप के आलम से और
सायों के तिनके समुंदर से निकाले जाएँगे
तेरी जैसी ख़ुश्बू मिट्टी से निकाली जाएगी
तेरे जैसे चेहरे पत्थर से निकाले जाएँगे
जब हमारी नींद आएगी तलाशी लेने तब
ख़्वाबों के कुछ टुकड़े बिस्तर से निकाले जाएँगे
क्या पता कब टूट जाए एक समझौते की डोर
क्या पता कब तेरे दफ़्तर से निकाले जाएँगे
एक दिन मेरे बदन के ज़ख़्म सिलने के लिए
सारे धागे तेरे पैकर से निकाले जाएँगे
इस सेे बढ़कर वक़्त भी मोहलत नहीं देगा 'रिदम'
एक दो दिन तो कैलेंडर से निकाले जाएँगे
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