Saba Akbarabadi

Saba Akbarabadi

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Saba Akbarabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saba Akbarabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो
जिस की सूरत नज़र आए वही सूरत समझो

ग़म को ग़म और न मुसीबत को मुसीबत समझो
जो दर-ए-दोस्त से मिल जाए ग़नीमत समझो

झुक के जो सैंकड़ों फ़ित्नों को जगा सकती हैं
वो निगाहें अगर उट्ठें तो क़यामत समझो

नहीं होते हैं रिया-कारी के सज्दे मुझ से
मैं अगर सर न झुकाऊँ तो इबादत समझो

रफ़्ता रफ़्ता मिरी ख़ुद्दारी से वाक़िफ़ होगे
अभी कुछ दिन मिरे अंदाज़-ए-मोहब्बत समझो

जल्वा देखोगे कहाँ दिल के अलावा अपना
मिरे टूटे हुए आईने की क़िस्मत समझो

कम नहीं दूर असीरी में सहारा ये भी
क़ैद में याद-ए-नशेमन को ग़नीमत समझो

ख़ूब समझाया है ये कातिब-ए-क़िस्मत ने हमें
जो मयस्सर हो जहाँ में उसे क़िस्मत समझो

हम-जफ़ाओं को भी अंदाज़-ए-इनायत समझें
और तुम शुक्र-ए-सितम को भी शिकायत समझो

मेरी आँखों में अभी अश्क बहुत बाक़ी हैं
तुम जो महफ़िल में चराग़ों की ज़रूरत समझो

ऐ 'सबा' क्यूँ हो दर-ए-ग़ैर पे तौहीन-तलब
अपने ही दर को हमेशा दर-ए-दौलत समझो
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Saba Akbarabadi
उस का वादा ता-क़यामत कम से कम
और यहाँ मरने की फ़ुर्सत कम से कम

सह सके दर्द-ए-मोहब्बत कम से कम
दिल में इतनी तो हो ताक़त कम से कम

इस की यादों से कहाँ है दुश्मनी
शम्अ जलती शाम-ए-फ़ुर्क़त कम से कम

उस के मिलने से न होती रौशनी
घट तो जाती ग़म की ज़ुल्मत कम से कम

देखने से उन के ये हासिल हुआ
हो गई अपनी ज़ियारत कम से कम

उस के ख़त में और सब कुछ था मगर
सिर्फ़ मतलब की इबारत कम से कम

दर्द देने के वहाँ सामाँ बहुत
और तड़पने की इजाज़त कम से कम

क्यूँ ग़म-ए-दौराँ ज़ियादा मिल गया
थी हमें जिस की ज़रूरत कम से कम

ख़ैर तुम से दोस्ती मुश्किल सही
रहने दो साहिब-सलामत कम से कम

देख कर उन को ये अंदाज़ा हुआ
होगी ऐसी ही क़यामत कम से कम

दौलत-ए-ग़म की फ़रावानी सही
दामन-ए-दिल में है वुसअत कम से कम

ग़म नहीं जो चंद यादें साथ थीं
कर तो ली दिल की हिफ़ाज़त कम से कम

सीना-चाकी उम्र भर की है 'सबा'
ज़ख़्म सिलने की थी मुद्दत कम से कम
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Saba Akbarabadi
तुझ से दामन-कशाँ नहीं हूँ मैं
ऐ ज़मीं आसमाँ नहीं हूँ मैं

कारवाँ मेरे बाद आएगा
गर्द हूँ कारवाँ नहीं हूँ मैं

फैल सकता हूँ छा नहीं सकता
रौशनी हूँ धुआँ नहीं हूँ मैं

नाज़ है मुझ पे मेरे साने को
ज़हमत-ए-राएगाँ नहीं हूँ मैं

जुज़्व हूँ एक जावेदाँ कुल का
हाँ अगर जावेदाँ नहीं हूँ मैं

अपनी तक़दीर पर यक़ीन नहीं
आप से बद-गुमाँ नहीं हूँ मैं

दर-ओ-बस्त-ए-चमन को क्या जानूँ
फूल हूँ बाग़बाँ नहीं हूँ मैं

ज़िंदगी पर बहार है मुझ से
ज़िंदगी की ख़िज़ाँ नहीं हूँ मैं

या निगाह-ए-तलब हूँ या जल्वा
पर्दा-ए-दरमियाँ नहीं हूँ मैं

सोचने दीजिए मआल-ए-वफ़ा
आप से सरगिराँ नहीं हूँ मैं

मौत से छेड़-छाड़ जारी है
ज़ीस्त का नौहा-ख़्वाँ नहीं हूँ मैं

आशियाँ क्या बनाऊँ गुलशन में
क़ाबिल-ए-आशियाँ नहीं हूँ मैं

ऐ ग़म-ए-सब्र-आज़मा सुन ले
क़ाबिल-ए-इम्तिहाँ नहीं हूँ मैं

यूसुफ़ों का है कारवाँ मिरे साथ
यूसुफ़-ए-कारवाँ नहीं हूँ मैं

मैं 'सबा' आह भी नहीं करता
आश्ना-ए-फ़ुग़ाँ नहीं हूँ मैं
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Saba Akbarabadi
यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा
जो पहचाना तो क्या होगा न पहचाना तो क्या होगा

किसी को क्या ख़बर आँसू हैं क्यूँ चश्म-ए-मोहब्बत में
फ़ुग़ाँ से गूँज उट्ठेगा जो वीराना तो क्या होगा

हमारी सी मोहब्बत तुम को हम से हो तो क्या गुज़रे
बना दे शम्अ' को भी इश्क़ परवाना तो क्या होगा

यही होगा कि दुनिया अक़्ल का अंजाम देखेगी
हद-ए-वहशत से बढ़ जाएगा दीवाना तो क्या होगा

तअस्सुब दरमियाँ से आप को वापस न ले आए
हरम की राह में निकला सनम-ख़ाना तो क्या होगा

तसव्वुर कीजिए उस आने वाले दौर-ए-बरहम का
गदा तोड़ेंगे जब पिंदार-ए-शाहाना तो क्या होगा

मिटा दो हसरत-ए-आबादी-ए-दिल भी मिरे दिल से
ये जितना अब है इस से और वीराना तो क्या होगा

न तुम आओगे न आवाज़ अपनी लौट पाएगी
पुकारेगा तुम्हें सहरा में दीवाना तो क्या होगा

फ़रेब-ए-ज़िंदगी की दास्ताँ कहने को क्या कम है
क़यामत में ज़बाँ पर और अफ़्साना तो क्या होगा

लहू के दाग़ बढ़ जाएँगे कुछ दीवार-ए-ज़िंदाँ पर
ख़फ़ा हो जाएगा ज़िंदाँ से दीवाना तो क्या होगा

मुदावा हो नहीं सकता है दिल पर चोट खाने का
मिरे क़दमों पे रख दो ताज-ए-शाहाना तो क्या होगा

'सबा' जो ज़िंदगी भीगी हुई है बारिश-ए-गुल से
बुलाएगा किसी दिन उस को वीराना तो क्या होगा
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Saba Akbarabadi
अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है
आँख में ख़ून का क़तरा है कि चिंगारी है

हर नफ़स ज़ीस्त गुज़र जाने का ग़म तारी है
मौत का ख़ौफ़ भी इक रूह की बीमारी है

बावजूदे-कि मोहब्बत कोई ज़ंजीर नहीं
फिर भी दिल को मिरे एहसास-ए-गिरफ़्तारी है

कुछ इस अंदाज़ से उस ने ग़म-ए-फ़ुर्क़त बख़्शा
जैसे ये भी कोई इनआम-ए-वफ़ादारी है

ग़म-ए-ख़ामोश को बे-वज्ह तसल्ली देना
दिल-नवाज़ी की ये सूरत भी दिल-आज़ारी है

रोज़ हालात बदलते हैं ब-शर्त-ए-तौफ़ीक़
ज़ीस्त मजमूआ-ए-आसानी ओ दुश्वारी है

जागना इश्क़ में हर एक की तक़दीर नहीं
नींद क़ुर्बान हो जिस पर ये वो बेदारी है

की मिरे हाथ से यूँ नज़्र-ए-बहार उस ने क़ुबूल
जैसे ये फूल नहीं है कोई चिंगारी है

इक तग़ाफ़ुल से हुआ इश्क़ का दिल को एहसास
उस की ग़फ़लत का नतीजा मिरी हुश्यारी है

यूँ भी आराइश-ए-पैहम में उलझता है कोई
ये ख़ुद-आराई है देखो कि ख़ुद-आज़ारी है

मातम-ए-इश्क़ से फ़ुर्सत नहीं मिलती है 'सबा'
रोज़-ओ-शब अपनी उमीदों को अज़ा-दारी है
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Saba Akbarabadi
हुस्न जो रंग ख़िज़ाँ में है वो पहचान गया
फ़स्ल-ए-गुल जा मिरे दिल से तिरा अरमान गया

तू ख़ुदावंद-ए-मोहब्बत है मैं पहचान गया
दिल सा ज़िद्दी तिरी नज़रों का कहा मान गया

आइना-ख़ाना से होता हुआ हैरान गया
ख़ुद-फ़रामोश हुआ जो तुम्हें पहचान गया

अब तो मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त में चला आया हूँ
उस से क्या बहस रहा या मेरा ईमान गया

अपने दिल से भी छुपाने की थी कोशिश क्या क्या
वो मिरा हाल-ए-मोहब्बत जिसे तू जान गया

है यही हुक्म तो तामील करेंगे साहब
न करेंगे तुम्हें हम याद जो दिल मान गया

छिन गया कैफ़ बहकते हुए कम-ज़र्फ़ों में
मय-कदे से भी गया मैं तो परेशान गया

न मिला चैन किसी हाल में मजबूरों को
मुस्कुराए तो हर इक शख़्स बुरा मान गया

अपनी रौ में जो बहाए लिए जाता था हमें
वो ज़माना वो तमन्नाओं का तूफ़ान गया

झुक के चूमी जो ज़मीं उस की गली की हम ने
कुफ़्र चीख़ा कि सँभालो मिरा ईमान गया

तीलियाँ ख़ून से तर देखीं क़फ़स की जो 'सबा'
अपनी सूखी हुई आँखों पे मिरा ध्यान गया
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Saba Akbarabadi
उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें
बिजलियों में रह के तिनकों का भरोसा क्या करें

ज़ब्त आँसू जब किए तो उछला चेहरे पर लहू
ग़म की मौजें रोकने से रास्ता पैदा करें

कहते हैं क़िस्सा ज़माने से यही तशवीश है
सी लिए हैं लब मगर इन आँसुओं को क्या करें

हम भी बंदे हैं हमें भी मक़दरत इतनी तो है
वो ख़ुदा बन जाए जिस के सामने सज्दा करें

ताक़त-ए-दीदार ज़ाहिर और आँखों को ये शौक़
बस तुम्हें देखा करें देखा करें देखा करें

चाहते ये हैं कि राह-ए-ज़िंदगी हमवार हो
सोचते ये हैं कि दुनिया को तह-ओ-बाला करें

बेवफ़ा सूरज ढला जाता है चश्म-ए-शौक़ से
और कब तक ए'तिबार-ए-वादा-ए-फ़र्दा करें

मस्लहत का ये तक़ाज़ा है कि हँसना चाहिए
बज़्म-ए-हस्ती में 'सबा' कब तक ग़म-ए-दुनिया करें
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Saba Akbarabadi
तुम ने रस्म-ए-जफ़ा उठा दी है
हमें किस जुर्म की सज़ा दी है

शम-ए-उम्मीद क्यूँ जला दी है
इश्क़ तारीकियों का आदी है

आप ने ख़ुद मुझे सदा दी है
या मिरी क़ुव्वत-ए-इरादी है

हम तो मुद्दत के मर गए होते
मौत ने ज़िंदगी बढ़ा दी है

अब दुआ पर भी ए'तिमाद नहीं
ना-मुरादी सी ना-मुरादी है

तुझ सा बेदाद-गर कहाँ होगा
लब-ए-हर-ज़ख़्म ने दुआ दी है

मुख़्तलिफ़ हैं तसव्वुरात-ए-जमाल
ये अक़ीदा भी इन्फ़िरादी है

देख फ़ितरत की बज़्म-आराई
ख़ाक पर चाँदनी बिछा दी है

ये जो छोटी सी है कली सर-ए-शाख़
बाग़ की बाद शाहज़ादी है

लब-ए-तस्वीर-ए-दोस्त कुछ तो बता
किस ने ये ख़ामुशी सिखा दी है

ऐ 'सबा' कीमिया-ए-ग़म के लिए
ज़िंदगी ख़ाक में मिला दी है
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Saba Akbarabadi
है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ
बोरिया तख़्त-ए-सुलैमाँ है ये मा'लूम हुआ

दिल-ए-आगाह पशेमाँ है ये मा'लूम हुआ
इल्म ख़ुद जहल का इरफ़ाँ है ये मा'लूम हुआ

अपने ही वाहिमे के सब हैं उतार और चढ़ाव
न समुंदर है न तूफ़ाँ है ये मा'लूम हुआ

ढूँडने निकले थे जमईयत-ए-ख़ातिर लेकिन
शहर का शहर परेशाँ है ये मा'लूम हुआ

हम ने आबादी-ए-आलम पे नज़र जब डाली
दिल की दुनिया अभी वीराँ है ये मा'लूम हुआ

इंक़लाब आप ही दुनिया में नहीं आते हैं
वो नज़र सिलसिला जुम्बाँ है ये मा'लूम हुआ

बादशाही भी नज़र आती है मुहताज-ए-ख़िराज
ताज कश्कोल-ए-गदा याँ है ये मा'लूम हुआ

उन के क़दमों पे जो गिर जाए वही क़तरा-ए-अश्क
हासिल-ए-दीदा-ए-गिर्यां है ये मा'लूम हुआ

उन की नज़रों पे जो चढ़ जाए वही ज़र्रा-ए-ख़ाक
सुर्मा-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ है ये मा'लूम हुआ

उन के दर तक जो पहुँच जाए वही आबला-पा
रहबर-ए-क़ाफ़िला-ए-जाँ है ये मा'लूम हुआ

आबियारी जो करे ख़ून-ए-रग-ए-जाँ तो 'सबा'
दिल-ए-हर-ज़र्रा गुलिस्ताँ है ये मा'लूम हुआ
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Saba Akbarabadi
इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है
जैसे हमें कुल आलम-ए-इम्काँ से गिला है

किस आँख ने समझा मिरी बे-बाल-ओ-परी से
जो कुछ मुझे दीवार-ए-गुलिस्ताँ से गिला है

आ ख़ंजर-ए-दिलदार मिरे दिल को सुना दे
शायद तुझे कुछ मेरी रग-ए-जाँ से गिला है

छोड़ा है कहाँ साथ मिरे दस्त-ए-जुनूँ का
कम-माएगी-ए-दामन-ए-इम्काँ से गिला है

कहते हैं बस उतनी ही तिरी ताब-ए-यक़ीं थी
है कुफ़्र से शिकवा मिरे ईमाँ से गिला है

इक लफ़्ज़-ए-तसल्ली मिरे हिस्से में न आया
ऐ ज़ौक़-ए-समाअत लब-ए-जानाँ से गिला है

मिल जाती है जाँ क़र्ज़ मगर मय नहीं मिलती
बेगानगी-ए-बादा-फ़रोशाँ से गिला है

ईमान का पिंदार लिए फिरता हूँ हर सू!
ये भी उसी ग़ारत-गर-ए-ईमाँ से गिला है

कैसे दिल-ए-तन्हा ने बनाए हैं मुख़ातब
दीवारों से शिकवा दर-ए-ज़िंदाँ से गिला है

कहते हैं 'सबा' चाँदनी गुलशन की न देखे
उस शख़्स को अरबाब-ए-गुलिस्ताँ से गिला है
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Saba Akbarabadi
उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं
इश्क़ ही इश्क़ की क़ीमत हो ज़रूरी तो नहीं

एक दिन आप की बरहम-निगही देख चुके
रोज़ इक ताज़ा क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं

मेरी शम्ओं को हवाओं ने बुझाया होगा
ये भी उन की ही शरारत हो ज़रूरी तो नहीं

अहल-ए-दुनिया से मरासिम भी बरतने होंगे
हर नफ़स सिर्फ़ इबादत हो ज़रूरी तो नहीं

दोस्ती आप से लाज़िम है मगर इस के लिए
सारी दुनिया से अदावत हो ज़रूरी तो नहीं

पुर्सिश-ए-हाल को तुम आओगे उस वक़्त मुझे
लब हिलाने की भी ताक़त हो ज़रूरी तो नहीं

सैकड़ों दर हैं ज़माने में गदाई के लिए
आप ही का दर-ए-दौलत हो ज़रूरी तो नहीं

बाहमी रब्त में रंजिश भी मज़ा देती है
बस मोहब्बत ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

ज़ुल्म के दौर से इकराह-ए-दिली काफ़ी है
एक ख़ूँ-रेज़ बग़ावत हो ज़रूरी तो नहीं

एक मिस्रा भी जो ज़िंदा रहे काफ़ी है 'सबा'
मेरे हर शेर की शोहरत हो ज़रूरी तो नहीं
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Saba Akbarabadi
जवानी ज़िंदगानी है न तुम समझे न हम समझे
ये इक ऐसी कहानी है न तुम समझे न हम समझे

हमारे और तुम्हारे वास्ते में इक नया-पन था
मगर दुनिया पुरानी है न तुम समझे न हम समझे

अयाँ कर दी हर इक पर हम ने अपनी दास्तान-ए-दिल
ये किस किस से छुपानी है न तुम समझे न हम समझे

जहाँ दो दिल मिले दुनिया ने काँटे बो दिए अक्सर
यही अपनी कहानी है न तुम समझे न हम समझे

मोहब्बत हम ने तुम ने एक वक़्ती चीज़ समझी थी
मोहब्बत जावेदानी है न तुम समझे न हम समझे

गुज़ारी है जवानी रूठने में और मनाने में
घड़ी-भर की जवानी है न तुम समझे न हम समझे

मता-ए-हुस्न-ओ-उल्फ़त पर यक़ीं कितना था दोनों को
यहाँ हर चीज़ फ़ानी है न तुम समझे न हम समझे

अदा-ए-कम-निगाही ने किया रुस्वा मोहब्बत को
ये किस की मेहरबानी है न तुम समझे न हम समझे
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