दिल-ए-आगाह पशेमाँ है ये मा'लूम हुआ
इल्म ख़ुद जहल का इरफ़ाँ है ये मा'लूम हुआ
अपने ही वाहि
में के सब हैं उतार और चढ़ाव
न समुंदर है न तूफ़ाँ है ये मा'लूम हुआ
ढूँडने निकले थे जमईयत-ए-ख़ातिर लेकिन
शहर का शहर परेशाँ है ये मा'लूम हुआ
हम ने आबादी-ए-आलम पे नज़र जब डाली
दिल की दुनिया अभी वीराँ है ये मा'लूम हुआ
इंक़लाब आप ही दुनिया में नहीं आते हैं
वो नज़र सिलसिला जुम्बाँ है ये मा'लूम हुआ
बादशाही भी नज़र आती है मुहताज-ए-ख़िराज
ताज कश्कोल-ए-गदा याँ है ये मा'लूम हुआ
उन के क़दमों पे जो गिर जाए वही क़तरा-ए-अश्क
हासिल-ए-दीदा-ए-गिर्यां है ये मा'लूम हुआ
उन की नज़रों पे जो चढ़ जाए वही ज़र्रा-ए-ख़ाक
सुर्मा-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ है ये मा'लूम हुआ
उन के दर तक जो पहुँच जाए वही आबला-पा
रहबर-ए-क़ाफ़िला-ए-जाँ है ये मा'लूम हुआ
आबियारी जो करे ख़ून-ए-रग-ए-जाँ तो 'सबा'
दिल-ए-हर-ज़र्रा गुलिस्ताँ है ये मा'लूम हुआ
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सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए
अब धूप सर पे आ गई है आँख खोलिए
अब धूप सर पे आ गई है आँख खोलिए
याद आ गया जो अपना गरेबाँ बहार में
दामन से मुँह लपेट लिया और रो लिए
अब और क्या करें तिरे तर्क-ए-सितम के बा'द
ख़ुद अपने दिल में आप ही नश्तर चुभो लिए
परवाना-ए-रिहाई-ए-ख़ामा तो मिल गया
लेकिन हुज़ूर अब दर-ए-ज़िंदाँ भी खोलिए
अपने लिए तअय्युन-ए-मंज़िल कोई नहीं
जो भीड़ जिस तरफ़ को चली साथ हो लिए
थी नागवार-ए-तब्अ तुझे सादगी-ए-इश्क़
ले आज हम ने पलकों में मोती पिरो लिए
हर इक ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश जहाँ हो सुख़न-शनास
बेहतर ये है 'सबा' कि वहाँ कुछ न बोलिए
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सई-ओ-अमल की रूह मोहब्बत के साथ थी
वो कुछ न कर सके जो मोहब्बत न कर सके
दुनिया में जितने ग़म मिले दिल में बसा लिए
हम सिर्फ़ तेरे ग़म पे क़नाअ'त न कर सके
अपना ही हाल-ए-ज़ार सुनाते रहे तुझे
लेकिन तिरे सितम की शिकायत न कर सके
ताराज कर के इश्क़ की बस्ती चले गए
तुम फ़त्ह कर के दिल पे हुकूमत न कर सके
दुनिया में अब भी लोग वफ़ा के हैं मुद्दई'
हासिल हमारे हाल से इबरत न कर सके
है काफ़िर-ए-अदब मिरे मशरब में ऐ 'सबा'
शाइ'र जो एहतिराम रिवायत न कर सके
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हर नफ़स ज़ीस्त गुज़र जाने का ग़म तारी है
मौत का ख़ौफ़ भी इक रूह की बीमारी है
बावजूदे-कि मोहब्बत कोई ज़ंजीर नहीं
फिर भी दिल को मिरे एहसास-ए-गिरफ़्तारी है
कुछ इस अंदाज़ से उस ने ग़म-ए-फ़ुर्क़त बख़्शा
जैसे ये भी कोई इनआम-ए-वफ़ादारी है
ग़म-ए-ख़ामोश को बे-वज्ह तसल्ली देना
दिल-नवाज़ी की ये सूरत भी दिल-आज़ारी है
रोज़ हालात बदलते हैं ब-शर्त-ए-तौफ़ीक़
ज़ीस्त मजमूआ-ए-आसानी ओ दुश्वारी है
जागना इश्क़ में हर एक की तक़दीर नहीं
नींद क़ुर्बान हो जिस पर ये वो बेदारी है
की मिरे हाथ से यूँ नज़्र-ए-बहार उस ने क़ुबूल
जैसे ये फूल नहीं है कोई चिंगारी है
इक तग़ाफ़ुल से हुआ इश्क़ का दिल को एहसास
उस की ग़फ़लत का नतीजा मिरी हुश्यारी है
यूँ भी आराइश-ए-पैहम में उलझता है कोई
ये ख़ुद-आराई है देखो कि ख़ुद-आज़ारी है
मातम-ए-इश्क़ से फ़ुर्सत नहीं मिलती है 'सबा'
रोज़-ओ-शब अपनी उमीदों को अज़ा-दारी है
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उस का वा'दा ता-क़यामत कम से कम
और यहाँ मरने की फ़ुर्सत कम से कम
और यहाँ मरने की फ़ुर्सत कम से कम
सह सके दर्द-ए-मोहब्बत कम से कम
दिल में इतनी तो हो ताक़त कम से कम
इस की यादों से कहाँ है दुश्मनी
शम्अ'' जलती शाम-ए-फ़ुर्क़त कम से कम
उस के मिलने से न होती रौशनी
घट तो जाती ग़म की ज़ुल्मत कम से कम
देखने से उन के ये हासिल हुआ
हो गई अपनी ज़ियारत कम से कम
उस के ख़त में और सब कुछ था मगर
सिर्फ़ मतलब की इबारत कम से कम
दर्द देने के वहाँ सामाँ बहुत
और तड़पने की इजाज़त कम से कम
क्यूँ ग़म-ए-दौराँ ज़ियादा मिल गया
थी हमें जिस की ज़रूरत कम से कम
ख़ैर तुम से दोस्ती मुश्किल सही
रहने दो साहिब-सलामत कम से कम
देख कर उन को ये अंदाज़ा हुआ
होगी ऐसी ही क़यामत कम से कम
दौलत-ए-ग़म की फ़रावानी सही
दामन-ए-दिल में है वुसअत कम से कम
ग़म नहीं जो चंद यादें साथ थीं
कर तो ली दिल की हिफ़ाज़त कम से कम
सीना-चाकी उम्र भर की है 'सबा'
ज़ख़्म सिलने की थी मुद्दत कम से कम
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ग़म को ग़म और न मुसीबत को मुसीबत समझो
जो दर-ए-दोस्त से मिल जाए ग़नीमत समझो
झुक के जो सैंकड़ों फ़ित्नों को जगा सकती हैं
वो निगाहें अगर उट्ठें तो क़यामत समझो
नहीं होते हैं रिया-कारी के सज्दे मुझ से
मैं अगर सर न झुकाऊँ तो इबादत समझो
रफ़्ता रफ़्ता मिरी ख़ुद्दारी से वाक़िफ़ होगे
अभी कुछ दिन मिरे अंदाज़-ए-मोहब्बत समझो
जल्वा देखोगे कहाँ दिल के अलावा अपना
मिरे टूटे हुए आईने की क़िस्मत समझो
कम नहीं दूर असीरी में सहारा ये भी
क़ैद में याद-ए-नशेमन को ग़नीमत समझो
ख़ूब समझाया है ये कातिब-ए-क़िस्मत ने हमें
जो मुयस्सर हो जहाँ में उसे क़िस्मत समझो
हम-जफ़ाओं को भी अंदाज़-ए-इनायत समझें
और तुम शुक्र-ए-सितम को भी शिकायत समझो
मेरी आँखों में अभी अश्क बहुत बाक़ी हैं
तुम जो महफ़िल में चराग़ों की ज़रूरत समझो
ऐ 'सबा' क्यूँ हो दर-ए-ग़ैर पे तौहीन-तलब
अपने ही दर को हमेशा दर-ए-दौलत समझो
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तड़पने पर हमारे आप रोकेंगे हँसी कब तक
ये माथे की शिकन कब तक ये अबरू की कजी कब तक
किरन फूटी उफ़ुक़ पर आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर की
सुनाए जाओ अपनी दास्तान-ए-ज़िंदगी कब तक
दयार-ए-इश्क़ में इक क़ल्ब-ए-सोज़ाँ छोड़ आए थे
जलाई थी जो हम ने शम्अ'' रस्ते में जली कब तक
जो तुम पर्दा उठा देते तो आँखें बंद हो जातीं
तजल्ली सामने आती तो दुनिया देखती कब तक
तह-ए-गिर्दाब की भी फ़िक्र कर ऐ डूबने वाले
नज़र आती रहेगी साहिलों की रौशनी कब तक
कभी तो ज़िंदगी ख़ुद भी इलाज-ए-ज़िंदगी करती
अजल करती रहे दरमान-ए-दर्द-ए-ज़िंदगी कब तक
वो दिन नज़दीक हैं जब आदमी शैताँ से खेलेगा
खिलौना बन के शैताँ का रहेगा आदमी कब तक
कभी तो ये फ़साद-ए-ज़ेहन की दीवार टूटेगी
अरे आख़िर ये फ़र्क़-ए-ख़्वाजगी-ओ-बंदगी कब तक
दयार-ए-इश्क़ में पहचानने वाले नहीं मिलते
इलाही मैं रहूँ अपने वतन में अजनबी कब तक
मुख़ातब कर के अपने दिल को कहना हो तो कुछ कहिए
'सबा' उस बे-वफ़ा के आसरे पर शा'इरी कब तक
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सुब्ह तक ख़त्म हो ही जाएगा
ज़िंदगी रात भर का क़िस्सा है
दिल की बातें ज़बाँ पे क्यूँ लाओ
घर में रहने दो घर का क़िस्सा है
कोई तलवार क्या बताएगी
दोश का और सर का क़िस्सा है
होश आ जाए तो सुनाऊँगा
चश्म-ए-दीवाना-गर का क़िस्सा है
चलते रहना तो कोई बात न थी
सिर्फ़ सम्त-ए-सफ़र का क़िस्सा है
जीते-जी ख़त्म हो नहीं सकता
ज़िंदगी उम्र भर का क़िस्सा है
शाम को हम सुनाएँगे तुम को
शब-ए-ग़म की सहर का क़िस्सा है
तेरे नक़्श-ए-क़दम की बात नहीं
सिर्फ़ शम्स ओ क़मर का क़िस्सा है
दामन-ए-ख़ुश्क लाओ फिर सुनना
ये मिरी चश्म-ए-तर का क़िस्सा है
चंद तिनके न थे नशेमन के
बाग़-ओ-शाख़-ओ-शजर का क़िस्सा है
हल्क़ में चुभ रहे हैं काँटे से
लब पे गुल-हा-ए-तर का क़िस्सा है
मेरी बर्बादियों का हाल न पूछ
एक नीची नज़र का क़िस्सा है
उसी बेदाद-गर से कह दे 'सबा'
उसी बेदाद-गर का क़िस्सा है
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जवानी ज़िंदगानी है न तुम समझे न हम समझे
ये इक ऐसी कहानी है न तुम समझे न हम समझे
ये इक ऐसी कहानी है न तुम समझे न हम समझे
हमारे और तुम्हारे वास्ते में इक नया-पन था
मगर दुनिया पुरानी है न तुम समझे न हम समझे
अयाँ कर दी हर इक पर हम ने अपनी दास्तान-ए-दिल
ये किस किस से छुपानी है न तुम समझे न हम समझे
जहाँ दो दिल मिले दुनिया ने काँटे बो दिए अक्सर
यही अपनी कहानी है न तुम समझे न हम समझे
मोहब्बत हम ने तुम ने एक वक़्ती चीज़ समझी थी
मोहब्बत जावेदानी है न तुम समझे न हम समझे
गुज़ारी है जवानी रूठने में और मनाने में
घड़ी-भर की जवानी है न तुम समझे न हम समझे
मता-ए-हुस्न-ओ-उल्फ़त पर यक़ीं कितना था दोनों को
यहाँ हर चीज़ फ़ानी है न तुम समझे न हम समझे
अदा-ए-कम-निगाही ने किया रुस्वा मोहब्बत को
ये किस की मेहरबानी है न तुम समझे न हम समझे
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उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं इश्क़ ही इश्क़ की क़ीमत हो ज़रूरी तो नहीं
एक दिन आप की बरहम-निगही देख चुके
रोज़ इक ताज़ा क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं
मेरी शम्ओं को हवाओं ने बुझाया होगा
ये भी उन की ही शरारत हो ज़रूरी तो नहीं
अहल-ए-दुनिया से मरासिम भी बरतने होंगे
हर नफ़स सिर्फ़ इबादत हो ज़रूरी तो नहीं
दोस्ती आप से लाज़िम है मगर इस के लिए
सारी दुनिया से अदावत हो ज़रूरी तो नहीं
पुर्सिश-ए-हाल को तुम आओगे उस वक़्त मुझे
लब हिलाने की भी ताक़त हो ज़रूरी तो नहीं
सैकड़ों दर हैं ज़माने में गदाई के लिए
आप ही का दर-ए-दौलत हो ज़रूरी तो नहीं
बाहमी रब्त में रंजिश भी मज़ा देती है
बस मोहब्बत ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं
ज़ुल्म के दौर से इकराह-ए-दिली काफ़ी है
एक ख़ूँ-रेज़ बग़ावत हो ज़रूरी तो नहीं
एक मिस्रा भी जो ज़िंदा रहे काफ़ी है 'सबा'
मेरे हर शे'र की शोहरत हो ज़रूरी तो नहीं
Read Fullरोज़ इक ताज़ा क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं
मेरी शम्ओं को हवाओं ने बुझाया होगा
ये भी उन की ही शरारत हो ज़रूरी तो नहीं
अहल-ए-दुनिया से मरासिम भी बरतने होंगे
हर नफ़स सिर्फ़ इबादत हो ज़रूरी तो नहीं
दोस्ती आप से लाज़िम है मगर इस के लिए
सारी दुनिया से अदावत हो ज़रूरी तो नहीं
पुर्सिश-ए-हाल को तुम आओगे उस वक़्त मुझे
लब हिलाने की भी ताक़त हो ज़रूरी तो नहीं
सैकड़ों दर हैं ज़माने में गदाई के लिए
आप ही का दर-ए-दौलत हो ज़रूरी तो नहीं
बाहमी रब्त में रंजिश भी मज़ा देती है
बस मोहब्बत ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं
ज़ुल्म के दौर से इकराह-ए-दिली काफ़ी है
एक ख़ूँ-रेज़ बग़ावत हो ज़रूरी तो नहीं
एक मिस्रा भी जो ज़िंदा रहे काफ़ी है 'सबा'
मेरे हर शे'र की शोहरत हो ज़रूरी तो नहीं
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