आते हुए मिले भी थे तुम किसी से,बोलो
सचमुच नहीं तो ख़ुद को बे-पैरहन दिखाओ
अच्छा तो ऐसे मिलना ना-मुमकिन है क्या
ले फिर, तेरे ख़ातिर हम मर ही जाते हैं
"मेरे बाद"
जब मैं तेरे पुकारने पे न आऊँ
जब मेरे क़दमों के नक़्श तेरी गलियों से मिट जाएँ
जब तेरी हिचकियाँ भी रुक जाए
लगे की कोई याद नहीं कर रहा
या नहीं आए आवाज़ किसी महफ़िल से
नहीं आए आवाज़ मेरी ,कोई नज़्म पढ़ते हुए
जब कोई मुंतज़िर आँखें नहीं दिखे तुम्हें
या दिखे इक लड़की रोती हुई
जो सिसकियाँ लेकर ,पढ़ रही हो मेरी ग़ज़लें
जब ख़ाली दिखे तुम्हें वो चबूतरा,जहाँ
मैं बैठकर ग़ज़ल लिखता था
जब वो गली भी सुनसान दिखे,
जहां हमारी दास्ताँ का आगाज़ हुआ था,
या दिखे वो मोड़ आवारा,
जहां हम मिलकर , बिछड़ गए थे,
जब मेरे नाम पे हर नज़र झुक जाए,
तब पूछना किसी बच्चे से,
और आ जाना
शहर के आख़िरी कब्र पे,
इक गुलाब लेकर,
रखना गुलाब मेरी कब्र पर,
और इक आख़िरी बार आवाज लगाना मुझे,
फिर कहना
अलविदा,
अलविदा मेरे दोस्त,
अलविदा मेरे शायर
और खो जाना शहर के भीड़ में
सुनते नहीं किसी की भी
अन-सुलझा सा ख्याल हो
जो ये शराब छोड़ दो
तो आदमी कमाल हो
इस शाख से तिरी, जिस भी दिन उड़ेगा बुलबुल
उस दिन बगीचा तेरा वीरान होना तय है
बात सारी फिर कभी होगी अभी तो ये बता
वो जो बेटा है तिरा, फिलहाल दिखता कैसा है
घर मेरा जैसे मंदिर था उनके साथ बुलबुल
अब उनके बाद घर मय-ख़ाना बना रखा है