मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी
    तिरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे
    Shakeel Badayuni
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    चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल
    हौसला किस का बढ़ाता है कोई
    Shakeel Badayuni
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    मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारागर
    ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मेरा दर्द और बढ़ा न दे
    Shakeel Badayuni
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    ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए
    मज़ा जब है तुम्हारी हर अदा क़ातिल ही कहलाए
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    कभी यक-ब-यक तवज्जोह कभी दफ़अतन तग़ाफ़ुल
    मुझे आज़मा रहा है कोई रुख़ बदल बदल कर
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    नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
    ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
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    अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे
    बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे

    वो वक़्त भी ख़ुदा न दिखाए कभी मुझे
    उन की नदामतों पे हो शर्मिंदगी मुझे

    रोने पे अपने उन को भी अफ़्सुर्दा देख कर
    यूँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे

    यूंदीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर
    मैं ज़िंदगी को याद करूँ ज़िंदगी मुझे

    रखना है तिश्ना-काम तो साक़ी बस इक नज़र
    सैराब कर न दे मिरी तिश्ना-लबी मुझे

    पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद
    इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे

    राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों 'शकील'
    हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे
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    Shakeel Badayuni
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    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
    सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है
    इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे
    ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है
    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल

    ताज वो शम्अ है उल्फ़त के सनम-ख़ाने की
    जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
    संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
    मरहले प्यार के आसाँ भी हैं दुश्वार भी हैं
    दिल को इक जोश इरादों को जवानी दी है
    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल

    ताज इक ज़िंदा तसव्वुर है किसी शाएर का
    उस का अफ़्साना हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं
    इस के आग़ोश में आ कर ये गुमाँ होता है
    ज़िंदगी जैसे मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
    ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है
    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल

    ये हसीं रात ये महकी हुई पुर-नूर फ़ज़ा
    हो इजाज़त तो ये दिल इश्क़ का इज़हार करे
    इश्क़ इंसान को इंसान बना देता है
    किस की हिम्मत है मोहब्बत से जो इंकार करे
    आज तक़दीर ने ये रात सुहानी दी है
    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज महल

    सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है
    इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
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    Shakeel Badayuni
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    मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
    मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे

    मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी
    मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे

    मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर
    ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे

    मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं
    मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे

    वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
    तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
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    Shakeel Badayuni
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    यूं तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
    आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
    Shakeel Badayuni
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