किसी को अपना बना रहा हूँ
वफ़ा को दिल से निभा रहा हूँ
ये हाल अपना बता रहा हूँ
ज़वाब तुम को सुना रहा हूँ
बदल रहा हूँ मैं वक़्त मेरा
मैं अपनी हस्ती बचा रहा हूँ
कभी तो ख़ूँ में नहा रहा था
अभी मैं ख़ुद को सजा रहा हूँ
हमें कहानी सुनाओ क्यूँ तुम
मैं दुनिया अपनी बसा रहा हूँ
ये बात सारी है निकली दिल से
जो दिल था टूटा बना रहा हूँ
जो हाल सारा सुना रहा था
उसी से मिलने को जा रहा हूँ
नया दिया इक जला रहा हूँ
मैं घर को 'जोहैर' आ रहा हूँ
— Zohair Ahmad Sahil















