कच्चे बहुत थे वादों के धागे
पक्के बहुत हैं यादों के धागे
उलझे हुए हैं कब से न जाने
पलकों पे तेरे ख़्वाबों के धागे
चेहरे पे मेरे बिखरे हुए हैं
उलझे हुए इन लफ़्ज़ों के धागे
मिट्टी का चोला मिट्टी की काया
साँसों के जैसे लम्हों के धागे
सुलझी नहीं है उलझन ये अपनी
जकड़े हुए हैं रातों के धागे
सुलझा न पाया कोई भी इन को
उलझे हुए थे जज़्बों के धागे
कैसे बुने हम सपनों की चादर
टूटे हुए हैं आसों के धागे
चुप हो गए लब रूहें सिसकतीं
टूटे हुए हैं बातों के धागे
थकता नहीं है दिल ये 'ज़ुबैर' अब
बुनते हुए इन वहमों के धागे
— Zubair ahmed















