कहानी को नया इक मोड़ दोगी क्या
मेरे ख़ातिर उसे तुम छोड़ दोगी क्या
नहीं उम्मीद तुम सेे लौट आओगी
मगर आकर मुझे झिंझोड़ दोगी क्या
मैं साँसें ख़्वाब और दिल टूटने को हैं
हाँ फेवीकोल बनके जोड़ दोगी क्या
घड़ा दिल का नदी है चाहता भरना
उतरकर दिल में इसको फोड़ दोगी क्या
हिमाक़त दिल तुम्हें पाने की करता है
ये सोचे भी न इतना तोड़ दोगी क्या
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