100rav
100rav
Ghazal

ख़बर है क्यूँ तेरे गर्दन पे धब्बा है

मेरी थाली का खाना फिर से जूठा है

बता सकता हूँ कल वो साथ था तेरे
तुझे उस ने मुझे इस शब ने काटा है

बता देती तो क्या मैं रोक लेता था
उसे तो जिस्म मुझ को रूह पाना है

ये ज़ुल्फ़ें चाल ज़ाहिर कर रही हैं सब
उसी ने हाँ तेरा नक़्शा बिगाड़ा है

कभी भी शादी कर लूँगा तू आना बस
कहाँ बाज़ार में अब फूल ताज़ा है

— 100rav

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