मुझे गले लगाने को सभी से वो गले मिले
मिले भी यूँ कि बच्चा कोई ज़ोर-शोर से मिले
तू मेरे वाहिमों के शहर की नदी तो रेल मैं
कई दफ़ा तू रह में धूप सेंकते मुझे मिले
ज़रा नहीं सुनी अना ने एक आइने की जब
तो राह रोकते मुझे हज़ार आइने मिले
फ़क़त हैं इल्म दाइरे जहाँ शदीद चाह हो
सितारे सुब्ह भी मुझे फ़लक से झाँकते मिले
ख़िज़ाँ हो तो बहार भी बराबरी से हो यहाँ
मिले ग़म-ए-हयात तो इसी हिसाब से मिले
था लाज़िमी निकल न जाए इक गुहर भी आँख से
तभी तो दर्द ये तुम्हें सुख़न में बोलते मिले
— kapil verma















