कोने में जब खड़ी वो अपनी बाँह मोड़ती हैमुमकिन, मेरे ख़याल की परछाई ओढ़ती हैपुल ही नहीं है ज़रिया, दो पहाड़ जोड़ने काशायद के उस से मुझ को कोई खाई जोड़ती है— Amit Joshi anhad