बिना काँटों के हमको रहगुज़र अच्छा नहीं लगता
बहुत आसान हो जो वो सफ़र अच्छा नहीं लगता
हमें नाराज़गी पल दो पलों की अच्छी लगती है
चमकना बिजलियों का रात भर अच्छा नहीं लगता
मेरी आँखों में रहकर हाल मेरा पूछते हो तुम
कोई हो इतना हम सेे बेख़बर, अच्छा नहीं लगता
हमारे दर्दे दिल पे वाह वाही करते हो लेकिन
न जाने क्यूँँं हमारा दर्दे सर अच्छा नहीं लगता
तुम अपनी ज़िन्दगी बस चार दिन ही समझते हो
हमें क़िस्सा भी इतना मुख़्तसर अच्छा नहीं लगता
रकीबों से मैं कहता हूँ कि रस्ता छोड़ दें तेरा
यूँँ मरना जुग्नुओं का चाँद पर अच्छा नहीं लगता
जहाँ बंजर जमीनें हो बरसना लाज़मी है पर
जरा सी बात पर यूँं चश्म तर अच्छा नहीं लगता
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