वो तो ऐसे मेरी बातों पे मचल जाते है
जैसे रब मेरी दु'आओं पे मचल जाते है
एक दिन की है महक और नजाकत इतनी
जाने क्यूँँं भँवरे गुलाबों पे मचल जाते है
तंग कर लेते हैं वो अपने सवालों से मुझे
और ख़ुद मेरे सवालों पे मचल जाते हैं
सूख जाती है निगाहों में मुहब्बत तो फिर
नींद के फाख़्ते रातों पे मचल जाते हैं
बे-वफ़ा हम जो हुए हाल करोगे क्या फिर
आप जब मेरी वफाओं पे मचल जाते हैं
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