दरवाजों खिड़की से कुहरा यूँं अंदर आ जाता है
सर्दी बढ़ने पे ज्यूँँं कोई अपने घर आ जाता है
रस्मों की लहरों चीर के मेरे पास आ जाओ ना
जैसे चढ़ता दरिया चीर एक शनावर आ जाता है
जब मिसरों में तेरी यादों के बीजों को बोता हूँ
मेरी ग़ज़लों से इक गुलदस्ता बाहर आ जाता है
दूर से दिखने में तू बिल्कुल तेरे जैसी लगती है
आते आते मुझ तक मेरा ही पैकर आ जाता है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Aditya
our suggestion based on Aditya
As you were reading Kashmir Shayari Shayari