ये ज़िन्दगी ग़मगीन हैले साध वो परवीन हैक्या ही मज़ा बिन इन के भीसुख दुख ही तो जुद्रीन हैझुमके बना दुख टाँगे जबदिल तब से ही ये क्लीन हैखेलो न इस इक ज़ीस्त सेमिलती नहीं दो तीन हैहोगा न अब बे-रंग कुछचश्मा मिरा रंगीन है— Abha sethi