ये ज़िन्दगी ग़मगीन है
ले साध वो परवीन है
क्या ही मज़ा बिन इन के भी
सुख दुख ही तो जुद्रीन है
झुमके बना दुख टाँगे जब
दिल तब से ही ये क्लीन है
खेलो न इस इक ज़ीस्त से
मिलती नहीं दो तीन है
होगा न अब बे-रंग कुछ
चश्मा मिरा रंगीन है
— Abha sethi
ले साध वो परवीन है
क्या ही मज़ा बिन इन के भी
सुख दुख ही तो जुद्रीन है
झुमके बना दुख टाँगे जब
दिल तब से ही ये क्लीन है
खेलो न इस इक ज़ीस्त से
मिलती नहीं दो तीन है
होगा न अब बे-रंग कुछ
चश्मा मिरा रंगीन है
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