mire li.e na sahi aatish-e-jigar ke li.e | मिरे लिए न सही आतिश-ए-जिगर के लिए

  - Akash Rajpoot

मिरे लिए न सही आतिश-ए-जिगर के लिए
कभी तो आइए क़िस्सा-ए-मुख़्तसर के लिए

बदल में हमको भले तीरगी मिली लेकिन
चराग़ हमने जलाए ज़माने भर के लिए

सफ़र में हमने लुटा दी कमाई जितनी की
बचा के कुछ नहीं लाए हम अपने घर के लिए

वो मेरे ख़्वाब भी मिट्टी में मिल गए यारों
जो तीरगी में सजाए गए सहर के लिए

कहाँ थे आप कहाँ हम कहाँ पे मंज़िल थी
हमें ख़ुदा ने मिलाया था इक पहर के लिए

उधर के लोग मुख़ातिब हैं सर-ब-सर तुझ सेे
इधर के लोग तरसते हैं इक नज़र के लिए

कड़कती धूप में छाते के साथ निकला वो
हम ऐसे लोग भटकते रहे शजर के लिए

  - Akash Rajpoot

Aadmi Shayari

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