"तुम"
मेरा दिन भी तुम्हीं हो तुम्हीं शाम भी,
मेरा अल्लाह भी तुम हो तुम्हीं राम भी।
तन मेरा है मगर इस
में रहते हो तुम,
रक्त की धमनियों में भी बहते हो तुम।
दिल की धड़कन भी तुम हो तुम्हीं साँस हो
तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो।
मेरे चंचल से मन की तुम्हीं मीत हो,
जो बजे है हृदय में वो संगीत हो।
दिन दुनिया के इस शोर से भाग कर,
दिन दुपहरी में औ रात में जाग कर।
गढ़ रहा हूँ जिसे वो उपन्यास हो
तुम बहुत ख़ूब-सूरत सा एहसास हो।
— Alankrat Srivastava















