वक़्त के ज़ोर में बह गए
यार तन्हा ही हम रह गए
मिलना तो ज़ाया' सा हो गया
देखो हम दोस्त ही रह गए
रेत के घर हमारे थे जो
यूँ ही सहरा में ही बह गए
ख़्वाब वो जो हक़ीक़त न थे
वो कहीं दूर ही रह गए
हम न इज़हार तक कर सके
कैसा नासूर हम सह गए
अब वही सोचते रहते हैं
जो कभी कुछ भी तुम कह गए
— Amaan Ali















