मैं नहीं कहता कि अपनी जान समझो

हाँ मगर इंसान को इंसान समझो

गर तुम्हारी मुझ से अब बनती नहीं है
फिर मुझे तुम आज से अंजान समझो

जो बचा है वो बचा है दोस्तों का
दोस्तो तुम ये मेरा ऐलान समझो

राजनेता की शिकायत अफ़सरों से
अफ़सरों को इनका ही दरबान समझो

— Amit Rajvanshi 'Guru'

More by Amit Rajvanshi 'Guru'

Other ghazal from the same pen

See all from Amit Rajvanshi 'Guru' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling