ख़्वाबों का है वो शमशान समझती है
मेरे दिल को वो वीरान समझती है
कॉल बिज़ी हो तब कहती थी मौसी थीं
यार रक़ीबों को वो जान समझती है
अपने लहजे की छेनी से बार किया
मेरे दिल को वो चट्टान समझती है
बाप ने उसको शहर में पढ़ने भेजा है
सिगरेट को वो अपनी शान समझती है
ग़ज़लों में मैंने भी गाली लिक्खी हैं
वो उनको अपना गुणगान समझती है
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