साफ़ इनकार कर नहीं पाई
उन सेे मैं प्यार कर नहीं पाई
मैंने कोशिश हज़ार की लेकिन
फिर भी दीदार कर नहीं पाई
आज़ सोची थी बात कह दूँगी
ख़ैर इक़रार कर नहीं पाई
अपने दिल में जगह बनाई पर
उन सेे इज़हार कर नहीं पाई
वो मिला पूछने लगा मुझ सेे
'इश्क़ बेज़ार कर नहीं पाई
जो मिरा 'इश्क़ था मुहब्बत था
उसको सरदार कर नहीं पाई
लड़खड़ाती रही ग़ज़ल जानी
शे'र तहदार कर नहीं पाई
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