नज़र की शौखियाँ दिल में तराना छोड़ देती है

वो हर अंतिम बार, मिलने का बहाना छोड़ देती है

मेरा कान्हा जब दुनिया छोड़ने की हद पे होता है
तो राधा भी उसे रस्ता बताना छोड़ देती है

कौन सा तीर था मैं जो सदा सीधा ही जाता
ये राह-ए-ज़िंदगी है आगे जा कर मोड़ देती है

ऐसा कोई मसला नहीं होता की दिल बहले
हमारी ही घुटन अंदर से हम को तोड़ देती है

यही ज़िद है जमाने की तो लो ये भी किया हम ने
मैं उस को छोड़ देता हूँ वो मुझ को छोड़ देती है

— Aryan Goswami

More by Aryan Goswami

Other ghazal from the same pen

See all from Aryan Goswami →

Nigaah Shayari

Shers of nigaah.

All Nigaah Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling