आह! यूँँ टूटा भरम, सब कुछ ख़तम
उन्स, कीना, साद, ग़म,सब कुछ ख़तम
सारी हक़ बातों से पर्दा उठ चुका
क्या वहम क्या ख़ुशफ़हम, सब कुछ ख़तम
वक़्त भी गिनती से बाहर जा चुका
व्होल नंबर, सम, विषम, सब कुछ ख़तम
मौत की जानिब मुसलसल बढ़ रहे
रफ़्ता रफ़्ता, दम-ब-दम, सब कुछ ख़तम
अब कोई मुझ से ग़ज़ल होगी नहीं
जौक़, दानाई, क़लम, सब कुछ ख़तम
सारे रौशन दीप अशरफ़ बुझ गए
यूँ हवा थी बेरहम, सब कुछ ख़तम
— Ashraf Ali















