पड़ोसी
जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ,
ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ
बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ
ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ।
उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे
जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे
वो माकूल बाज़ी याद है,
जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था।
सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है
तेज़ तूफानी बारिश में एक छत
जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी
वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था।
और वो एक शाम
जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ से कुछ रूठ से गए थे
तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था,
भूला नहीं वो रात कि
मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था।
अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या,
समझते हो तो अच्छा है,
क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है।
अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है,
अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है।
मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है,
वही खाती है,
लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं।
कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ,
कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी,
लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है















