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Prashant Beybaar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prashant Beybaar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

चलो इक बात से बेबार की मुझ को तसल्ली है तवक़्क़ो ख़ुद किसी से वो कभी दिल में नहीं रखता — Beybaar
कोहरा जो देखा उस ने ठिठराके मुझ सेे पूछा मौसम ये सर्द है या हसरत जली है कोई — Beybaar
किनारे दो मिलाने में हैं कितनी मुश्किलें सोचो ये पुल दिन भर ही सीने पे बिचारा चोट खाता है — Beybaar
चलो भला है कि हर शख़्स तन्हा है दिल में वगरना कौन किसी का यहाँ सहारा बने — Beybaar
तुझ पे मर के हम ने आख़िर अब ये जाना ख़ा-मख़ा ही तुझ को माने ज़िन्दगी हम — Beybaar
किसी सीने पे आहट दी, किसी काँधे पे सर रक्खा हुए कितने भी बेपरवाह मगर बस एक घर रक्खा — Beybaar
भले हैं फ़ासले क़ुर्बत से ख़ौफ़ लगता है ये क्या बला है जो ऐसी विरानी क़ैद हुई — Beybaar
हैं ज़रूरी काम मुझ को शे'र कहने के सिवा भी सोचना और सोचना, बस सोचना उस को मुसलसल — Beybaar
बेकार मेरा ग़ुस्सा कुछ काम का नहीं है बाहों में भर ले गर वो सब भूल जाता हूँ मैं — Beybaar
वो दिन इज़हार का है याद अब तक इस क़दर मुझ को कि जैसे रातें उस के बा'द सब जगकर गुज़ारी हों — Beybaar
दर्द, आँसू, बे-क़रारी, हिज्र, यादें, बेख़ुदी कौन कहता है मोहब्बत में मिला कुछ भी नहीं — Beybaar
हमारे बीच में जो है, बचाके रखते हैं अब एक दूजे से दूरी बनाके रखते हैं — Beybaar

Ghazal

छुवन में मौत छुपी, दुनिया सारी क़ैद हुई दबी दबी सी यहाँ ज़िन्दगानी क़ैद हुई जो चीज़ दिखती नहीं है मगर क़रीब मिरे वो तेरी ख़ुश्बू सी बनके निशानी क़ैद हुई कहाँ तो टूट के बाहों में उस को भरते थे कहाँ यूँँ दीद की चाहत पुरानी क़ैद हुई ये सारी बैठकें सूनी पड़ी हैं तन्हा सी वो यार दोस्तों की सरगिरानी क़ैद हुई जो पाँव टिकते न थे घर में कोई भी क़ीमत वो मौज मस्ती वो तफ़री-गिरानी क़ैद हुई पुराने क़िस्सों पे जी भर के हम तो हँस लेंगे नई तरीन तिरी याद-दानी क़ैद हुई नई सदी की बला से ये आदमी हारा ये बात दौर की बनके कहानी क़ैद हुई वो एक वक़्त था जब फ़ासले थे दुश्वारी ये एक दौर है नज़दीक-आनी क़ैद हुई भले हैं फ़ासले क़ुर्बत से ख़ौफ़ लगता है ये क्या बला है जो ऐसी विरानी क़ैद हुई यहाँ किसे है गरज हम जियें या मर जाएँ सभी की अपनी ही कोई निशानी क़ैद हुई — Beybaar

Nazm

"शब-ए-इश्क़" सियाही की चादर यूँँ माथे सजा के फ़िज़ा में वो सुर में की रंगत मिला के मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है मगर किस को परवाह इन बातों की है कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें या आशिक़ शहर के यूँँ रातों को जागें भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से भला क्यूँँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँँ हम उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँँ हम वो शा में वो शा में कि जिस में ख़ुमारी छुपी थी इक आवारगी की जो लत सी लगी थी कभी इस गली से कभी उस गली तक क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर उसे अपना मक्का मदीना बनाना वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था उसे महँदी की सब दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था मुहल्ले में उस की झलक के बहाने गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई वो पलटे तो लगता था मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई अरे उफ्फो उम्म हम्म ये क्या कर रहा हूँ कहाँ की थीं शा में कहाँ ला रहा हूँ बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं ये तुम को दिखाएँ हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है — Beybaar
काग़ज़ की कश्ती उन रोज़ जब बचपन में कोई पनारा बहता था मन काग़ज़ की कश्ती बना कर संग संग उस के रहता था हम कश्तियाँ बना बना कर बारिश में बहाते रहते पनारा मिलता नाले में नाले मिलते दरिया में कोई कश्ती तो पहुँची होगी हम जागे रहते दुपहरिया में क्या ख़ूब ठिठोली होती थी वक़्त की मीठी गोली होती थी अभी अभी पता चला वो ऊपर बैठा खेल रहा है बना बना के भेज रहा है कश्तियाँ दरिया-ए-वक़्त में बहने के लिए कुछ गल जाएँगी कुछ डूब जाएँगी कुछ के गीले लुथड़े पहुँचेंगे लमहों की लहरों में फँसकर फिर से ख़ूब ठिठोली होगी ऊपर काग़ज़ की कश्ती का खेल मुसलसल वो मालिक हद-ए-वक़्त तक पहुँचाएँगे हम उसी ठिठोली की ख़ातिर गल गल कर बह जाएँगे. — Beybaar
ज़रा ठहर के आना जो इक वा'दा था तुम सेे, फ़िज़ा में खिलखिलाने का कहकशाँ में डूब जाने का जूड़े में तुम्हारे चाँद टिकाने का उगते सूरज को सीने से लगाने का जानाँ इस ख़्वाहिश में, थोड़ा वक़्त लगेगा गुमाँ की आज़माइश में थोड़ा वक़्त लगेगा कि ये दुनियाए ये मंज़र, ये शहरों में बंजर अभी महफूज़ नहीं हसीं ख़्वाबों के लिए किए सड़क पे ख़ून के थक्के अभी सूखे नहीं हैं सरिया लिए हाथ अब किताबों के भूखे नहीं हैं मज़हबी टुकड़े पे पलते सायों को अभी मुल्क में 'टुकड़े-टुकड़े' चलाने से फ़ुर्सत नहीं है कि अभी तो नस्ल को साबित है करना रहने को ज़िंदा अब ज़रूरी है डरना कि कानून के मानी अभी बदल रहे हैं हुक्मरां को इंक़लाबी अभी खल रहे हैं मुझे मालूम है बड़ा मन था तुम्हारा, जाड़े में, कुल्फ़ी का लुत्फ़ उठाने का वादी में, कहवा के दो कप लड़ाने का लालकिले पे बाँह फैलाने का, और श्डलश् की झरझर में डूब जाने का मगर जानांए अभी यहाँ, तेल की खदानों पे मिसाइलों के घेरे हैं बड़े काले से रोज़ यहाँ उठते सवेरे हैं कुछ अंदर के कीड़े सरहद कुतर रहे हैं बड़े-बड़े चेहरों के चेहरे अभी उतर रहे हैं और वो जो वा'दा था तुम सेे कि, तुम्हारी हथेली पे अपनी उँगली उगाकर तुम्हारे बालों में ग़ुलाबी से फूल सजाकर चलेंगे किनारे से मीलों के फ़ेरे देखेंगे तोता-ओ-मैना-ओ-बटेरे इन बातों की सूरत अभी मुमकिन नहीं है जीना न पूछो, हाँ मरना मुश्किल नहीं है अभी स्कैण्डल में साँसों की इक चीख़ दबी है उस लड़की की कैंडल-मार्च अभी रुकी नहीं है अभी आब-ओ-दाने के भाव बहुत हैं ढकी.ओढ़ी इस जनता के घाव बहुत हैं कि अभी सरज़मीं पे शो'ले भभक रहे हैं वर्दी से ख़ून के कतरे अभी टपक रहे हैं वो रातों का वा'दा, वो बुलाती सदायें खिड़की पे तुम्हारी, मल्हार गाती हवाएँ अभी इन बातों में थोड़ा सा वक़्त लगेगा अच्छे दिन का वो वा'दा ज़रा लंबा चलेगा जज साहब ये बोले की मुश्किल घड़ी है कुछ ज़ुल्मी सिफ़त, कुछ सियासी कड़ी है अभी कुफ़लों में क़ैद हैं लफ़्ज़ हमारे मिटाने को अक्स, हो रहे हैं इशारे वो इंसानियत की उसूलों-निगारी अभी मुमकिन नहीं, अभी मुमकिन नहीं सुनो तुम जानांए वो सारे ख़्वाब छुपाना ज़र्रे ज़र्रे को सारी ये बातें बताना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना — Beybaar
सुर्ख़ चाँद एक सुर्ख़ चाँद गोद में लिए हुए ईव फ़लक से उतरी है तुम्हारी नज़रों में उस की हिम्मत किरच के जितनी पतली है हर महीने की यही टीस है नहीं कहेगी तुम सेे वो, कि, सह रही है तुम्हारी नस्ल के लिए आने वाली लहराती फ़स्ल के लिए एक चाँद गढ़ा है कोख में वो दर्द समेटे तड़प रही है नब्ज़ फड़कती पेट को था में सुर्ख़ चाँदनी सिमट रही है पूनम से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष है अंदर अमावस्या से पूनम तक शुक्ल पक्ष है भीतर शबाब पे होता है तो महीना पूरा होता है लहू बहता है फ़लक से होकर सुर्ख़ चाँदनी सोखती हुई जीती है औरत और ये किरच चुभोता 'क्रेसेंट' कोख में फिर ढलता है पंद्रह दिन तक फिर बढ़ता है पंद्रह दिन तक जैसे आसमाँ में सरकता है चाँद कोई उन मुश्किल के पाँच दिनों में जब चाँद पूरे शबाब पे हो और अगर, कभी जो उस का हौसला कम पड़ जाए वो चुपके से तुम सेे अपनी नज़र छुपाए तो बढ़ा देना हाथ हिम्मत का, साथ का माना कि एक मर्द के लिए मुश्किल है समझ पाना, मगर तुम मत समझना, न ही कोशिश करना उस एहसास को जीने की बस भर देना गरम पानी की बोतल माँ, बहन या कोई और भी हो तो और अगर हो जीवन-संगिनी तो ले जाना उसे गोल-गप्पे खिलाने; रात के डेढ़ बजे, जब उसे चॉकलेट की तलब लगे तो मुस्कुरा कर ला देना फ्रिज से, एक जले गुड़ की ढेली; बाहों का सहारा दे देना, कह देना झूठे को ही, कि मैं हूँ, अपनी हथेली की गर्माहट भी रख दोगे उस के पेट पे अगर, तो वो गहरी नींद सो जाएगी, इसी भरम में कि तुम हो सोचो, कितना अंधा आसमाँ होगा उस का जो हर महीने चाँद की किरच छील छील कर फेंकती रहती है कपड़े में लपेटकर कहीं दूर ग़लती नहीं है उस की, मर्ज़ी भी नहीं है ख़ुदा ने उतारा है फ़लक से उस को एक औरत का जिस्म देकर ताकि तुम्हारी रातें रौशन हों और, तुम हो कि नज़र भी नहीं मिलाते हो कि कहीं ग़लती से भी मुँह से 'पीरियड्स' या 'मासिक-धर्म' जैसा कोई लफ़्ज़ न निकल जाए साफ़ रिश्ते में ख़लल न पड़ जाए मगर जिस के नाम में ही धर्म हो, उस सेे अधर्म जैसा सुलूक क्यूँँ तुम भी तो एडम का हिस्सा हो फिर अकेली ईव को टीस क्यूँँ । — Beybaar
पड़ोसी जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ, ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ। उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे वो माकूल बाज़ी याद है, जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था। सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है तेज़ तूफानी बारिश में एक छत जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था। और वो एक शाम जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ सेे कुछ रूठ से गए थे तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था, भूला नहीं वो रात कि मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था। अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या, समझते हो तो अच्छा है, क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है। अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है, अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है। मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है, वही खाती है, लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं। कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ, कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी, लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है — Beybaar
वो फ़िल्म कैसे मुमकिन हो जाता है एक ही वक़्त में, दो-दो जगह एक इंसान का होना मैं ने देखा था उस शब जब ट्यूशन के बा'द तुम ने आनन-फ़ानन में खींच के मेरा हाथ बिठाया था उस मोटी पर्दे के सामने जिस पर चल रही थी वो फ़िल्म ; एक ही वक़्त में मैं यहाँ भी था, और वहाँ भी तुम पर्दे पे भी थीं और मेरे नज़दीक भी एक अंशुमन हमारे बीच में भी था फ़िल्म दिख रही थी पर्दे पर मगर चल रही थी हमारे भीतर एक एक पल में सदियाँ तय करती हुई फ़िल्म आख़िरी शॉट में जो थोड़ा बहुत कहा उस हीरोईन ने फ़िल्म के बा'द तुम्हारी आँखों ने सब पूरी तरह कह दिया कैसे मुमकिन हुआ कि, हर शय हर डायलोग इतना ज़रूरी था वरना हम कभी समझ नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं. — Beybaar
अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मैं कोशिशें हज़ार करता हूँ मगर रूह है कि सिहर जाती है नज़र है कि ठहर जाती है ; सिग्नल पे खड़े उस नंगे बच्चे पे जो कार के शीशे पार से बेच रहा है आज़ादी । तेरे ख़यालों में डूबकर एक ग़ज़ल बुननी थी मुहब्बत में पड़ कर आशिक़ की राह चुननी थी मगर ज़ेहन की छत है कि टपक रही है टीस की धूरी लपक रही है और बन रहीं हैं तस्वीरें बेहिसाब। हैं तस्वीरें, बेवा औरत के ज़र्द चेहरे की यतीम बूढ़ी आँख में कोहरे की रोज़मर्रा के फंदे में, फँसते जीवन के मोहरे की । एक नौवीं की लड़की जो भटक रही है एक औरत जो कोठे पे तड़प रही है चूल्हे और बिस्तर के बीच में बीवी धीरे धीरे सदियों से सरक रही है । और भी कोफ़्त टटोलती तस्वीरें हैं यहाँ मैं हुस्न-ओ-इश्क़ लिखूँ तो कैसे, कि हस्पताल में घाव लिए मरीज़ों की कमी नहीं है यहाँ शहीदों की मौत पे आँखों में नमी नहीं है बस किसानों तक जो कभी पहुँची नहीं, वो तरक्की काग़ज़ों में थमी नहीं है । कूड़ेदान में कपड़े-जूते और पुराने सेलफ़ोन के नीचे हथेली भर की बच्ची की ठंडी लाश छुपी है । एक परियों की रानी सच्चे प्यार की ख़ातिर अपनी इज़्ज़त और यक़ीं, धोखे में गँवा चुकी है । दिल सुलग जाता है, मन बिखर जाता है देख कर, कि 'वीमन एम्पावर मेंट' वाले शहर के भीतर बड़े फ्लाईओवर और भीड़ की नज़रों से होकर लक्ष्मी तेज़ाब से अब भी झुलस रही है । सरकारी फ़ाइलों में खोई वो चप्पल सालों से अब तक घिसट रही है । और भी शय हैं दुनिया में मौजूद ; मेरा दोस्त जो कैंसर से घुट घुट के लड़ता है एक बाप घर खर्च की ख़ातिर ख़ुद से झगड़ता है घर के पड़ोस में कल ही 'लिनचिंग' हुई है ख़बरें कहती हैं सब क़ाबू है, कैसी 'चीटिंग' हुई है। हीर-रांझा के हिज्र का दर्द यक़ीनन है भारी जिस में तिनके भर का भी मुझ को भरम नहीं है मगर, फुटपाथ पे सिकुड़ते पेट की भूख के आगे जिस का जवान बेटा मरा हो, उस माँ की हूक के आगे, उस महबूब की जुदाई की कचोट कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है । और इन सब के बीच में मुहब्बत की बातें ग़ुलाब ओढ़े सवेरे, लिली फ्लावर की रातें हाँ, मगर बात ये भी सही है, कि तेरी हुस्न-ओ-अदास कभी दिल नहीं भरता तेरी याद के दरिया में डूबा, मन नहीं उबरता मगर ज़माने में और भी दर्द बचे हैं हर चुप्पी के पीछे अफ़साने दबे हैं क़लम झुक जाती है मेरी उन बेज़ुबानों की जानिब जिन के गूंगे फ़साने किसी से सुने नहीं हैं मगर, ऐ हुस्न-ए-जानां धुएं में आग न उकेरना तुम मेरी बेरया मुहब्बत से कभी मुँह न फेरना ऐसा नहीं है कि मुझे प्यार हासिल नहीं है ऐसा भी नहीं कि दिल दोस्ती मुमकिन नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है। — Beybaar