Beybaar
Beybaar
Nazm

वो फ़िल्म

कैसे मुमकिन हो जाता है
एक ही वक़्त में,
दो-दो जगह एक इंसान का होना

मैं ने देखा था उस शब
जब ट्यूशन के बा'द
तुम ने आनन-फ़ानन में खींच के मेरा हाथ
बिठाया था उस मोटी पर्दे के सामने
जिस पर चल रही थी
वो फ़िल्म ;
एक ही वक़्त में
मैं यहाँ भी था, और वहाँ भी
तुम पर्दे पे भी थीं और मेरे नज़दीक भी
एक अंशुमन हमारे बीच में भी था

फ़िल्म दिख रही थी पर्दे पर
मगर चल रही थी हमारे भीतर
एक एक पल में सदियाँ तय करती हुई फ़िल्म
आख़िरी शॉट में जो थोड़ा बहुत कहा उस हीरोईन ने
फ़िल्म के बा'द तुम्हारी आँखों ने सब पूरी तरह कह दिया

कैसे मुमकिन हुआ कि,
हर शय हर डायलोग इतना ज़रूरी था
वरना हम कभी समझ नहीं पाते
कि हम क्या चाहते हैं.

— Beybaar

More by Beybaar

Other nazm from the same pen

See all from Beybaar →

Charagh Shayari Collection

Shers of charagh shayari collection.

All Charagh Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling