रात काली है तो क्या है
चाँद की ही बद-दुआ है
इश्क़ ये कब था सुकूँ जो
इश्क़ अब बेदिल सज़ा है
तुम अकेले हो मगर वो
भीड़ में तन्हा हुआ है
मेरे दिल के जैसा ही है
टूटा फूटा घर बना है
जुर्म दिल के माफ़ हैं सब
बस तवक़्क़ो ही मना है
पूछो कुछ बेबार उस से
झूठा है लेकिन ख़ुदा है
— Beybaar















