"शब-ए-इश्क़"
सियाही की चादर यूँ माथे सजा के
फ़िज़ा में वो सुर
में की रंगत मिला के
मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे
ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है
अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है
अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है
अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है
अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है
मगर किस को परवाह इन बातों की है
कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया
या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने
झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप
दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें
या आशिक़ शहर के यूँ रातों को जागें
भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है
हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है
हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी
कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से
भला क्यूँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें
उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँ हम
उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँ हम
वो शा
में
वो शा
में कि जिस
में ख़ुमारी छुपी थी
इक आवारगी की जो लत सी लगी थी
कभी इस गली से कभी उस गली तक
क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना
उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर
उसे अपना मक्का मदीना बनाना
वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की
इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में
न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के
वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था
वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर
मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था
इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था
उसे महँदी की सब
दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था
मुहल्ले में उस की झलक के बहाने
गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई
वो पलटे तो लगता था
मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई
अरे उफ्फो उम्म हम्म
ये क्या कर रहा हूँ
कहाँ की थीं शा
में कहाँ ला रहा हूँ
बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं
ये तुम को दिखाएँ
हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस
उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ
कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी
मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है
मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो
ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है















