भीड़, भीड़, भीड़, इतनी भीड़ यारा बे-हिसाब

दरमियान इस के फिर भी दिल है तन्हा बे-हिसाब

हिज्र के सिरे पे हम हैं फिर ये क्या है जो जुड़ा
जितना दूर मैं गया वो याद आया बे-हिसाब

इक ज़रा सी ज़िन्दगी, दो छोटी छोटी जान और
इक ज़रा से रिश्ते में है शिकवा इतना बे-हिसाब

सुनने को झुको ज़रा तो बात अपनी मैं कहूँ
अदना सा मैं आदमी, ये क़द तुम्हारा बे-हिसाब

लब पे माफ़ी है मगर इन आँखों में है क्या छुपा
लफ़्ज़ कर रहे हैं मुझ से क्यूँ इशारा बे-हिसाब

— Beybaar

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Ishaara Shayari

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