ye log mujhko bula lenge phir kinaare par | ये लोग मुझको बुला लेंगे फिर किनारे पर

  - Shadab Asghar

ये लोग मुझको बुला लेंगे फिर किनारे पर
सो देखता ही नहीं अब किसी इशारे पर

मैं घर से निकला था रोटी कमाने के ख़ातिर
तमाम 'उम्र किया रक़्स इक़ इशारे पर

मैं हुँ वो शख़्स ज़माने में मुफलिसी की मिसाल
है उस की चाह के हो घर भी इक सितारे पर

हमें न चाहो किसी और को तो चाहोगे
करम ये होगा तो फ़िर क्यूँ नहीं हमारे पर

हमें हमारी कहानी से ही निकाला गया
सितारे तोड़ न पाए थे उस इशारे पर

वो काला सूट पहनकर जो मुस्कुराती है
हज़ार 'उम्र हो कुर्बान उस नज़ारे पर

उसे यकीन दिलाना है अपनी चाहत का
समझ लो रक़्स तो करना है पर शरारे पर

  - Shadab Asghar

Ishaara Shayari

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