
इक दवा अच्छी बता देना ज़रा तुम
ज़ख़्म पे मरहम लगा देना ज़रा तुम
चाँद निकला है, मिरा दिल ख़ुश बहुत है
ये ख़ुशी उस को सुना देना ज़रा तुम
रात आ जाए मगर मैं घर न लौटूँ
तब चराग़ों को जला देना ज़रा तुम
मैं अगर ख़ुद को भुला दूँ हाँ भुला दूँ
नींद से मुझ को जगा देना ज़रा तुम
कब्र पे फूलों की माला कुछ न देगी
आफ़ियत की ही दुआ देना ज़रा तुम
इन घरों में आग लगती ही रहेगी
आग हिम्मत से बुझा देना ज़रा तुम
— Meem Alif Shaz















