उसी की ओर मैं रुख़ मुश्किलों का मोड़ देता हूँ
मेरे बस में न हो कुछ तो ख़ुदा पर छोड़ देता हूँ
निभा लेता हूँ औरों से किए वादे तो अच्छे से
मगर ख़ुद से किए वादे मैं अक्सर तोड़ देता हूँ
मुझे अच्छा नहीं लगता है ख़ाली बैठना घर में
सो टूटी घर की चीज़ों को मैं बैठा जोड़ देता हूँ
अचानक और बढ़ने लगती है लोगों की दिलचस्पी
कहानी में नया जैसे ही कोई मोड़ देता हूँ
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















