अब किसी से कोई गिला है क्या
जो मिला है वही मिला है क्या
ज़ख़्म-ए-दिल भी ये भर गया शायद
दर्द की अब कोई दवा है क्या
एक मलबा है मुझ में यादों का
दिल मेरा कोई मक़बरा है क्या
राख मुट्ठी में भर के बैठा हूँ
अब हवाओं का फ़ैसला है क्या
बैठ कर ख़ुद से बात करता हूँ
मेरे अंदर भी दूसरा है क्या
ख़त्म कर 'मीम' आप ही ख़ुद को
'जौन' होना भी अब भला है क्या
— Meem Mohammed















