अपनी इस तन्हा-रवी से हो के रुख़्सत भी कहाँ जाएँ
जुस्तुजू में छोड़ कर हम अपनी ख़ल्वत भी कहाँ जाएँ
तुम ज़रा सोचो तुम्हारे इश्क़ में ठुकराए लोगों का
बा-जसारत चल न पाए बा-नदामत भी कहाँ जाएँ
तुम तो पा जाओगे मंज़िल को तुम्हारे पास तो सब है
हम तुम्हारे बा'द ले कर ये मुहब्बत भी कहाँ जाएँ
है मुक़द्दर इश्क़ की राहों में होना दर-ब-दर अपना
आप के दिल के निकाले कर के हिजरत भी कहाँ जाएँ
— Muntazir shrey















