वो मिरा दर्द-आश्ना रह जाए
और फिर इस ग़म में मुब्तिला रह जाए
हाल गर हम ख़राब-हालों का
कोई देखे तो देखता रह जाए
लाख मरहम के बा'द भी सोचो
ज़ख़्म मेरा अगर हरा रह जाए
टुकड़े इस दिल के गर समेटे कोई
और जोड़े तो जोड़ता रह जाए
वक़्त बे-रहम हो न इतना कि फिर
आने वालों से भी गिला रह जाए
कर के तर्क-ए-तअल्लुक़ात भी 'श्रेय'
हम में मुमकिन है राब्ता रह जाए
— Muntazir shrey















