"मुख़्तसर नज़्म"
ये दर्द-ए-दिल मुख़्तसर नहीं कर सकता
मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता
उस की बाहों में रहे तो मुख़्तसर
उस की बातें रहीं तो मुख़्तसर
अपनी ख़ुशियाँ भी रहीं हैं मुख़्तसर
वक़्त उल्फ़त-ओ-वस्ल का भी तो
मुख़्तसर ही रहा
अब हिज़्र का दायरां
मुख़्तसर नहीं कर सकता
दिन रहे तो मुख़्तसर
राते रहीं सो मुख़्तसर
अपनी ज़िन्दगी भी रही है मुख़्तसर
उस के साथ गुज़ारा हर इक लम्हा भी तो
मुख़्तसर ही रहा
अब दास्तान-ए-मोहब्बत
मुख़्तसर नहीं कर सकता
मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता
— Navneet Vatsal Sahil















