Navneet Vatsal Sahil

Navneet Vatsal Sahil

@Navneet_Vatsal_Sahil

Navneet Vatsal Sahil shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Navneet Vatsal Sahil's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सारे जग को अनदेखा कर देना तुम मुझ को अपनी आँखों में रख लेना तुम — Navneet Vatsal Sahil
गर तुझ से मैं रूठ नहीं सकता तो क्या मुझ को जान-ए-जाँ बे-वज्ह मनाया कर — Navneet Vatsal Sahil
यूँँ कमी तो खलेगी मिरी तुम बिगाड़े हुए हो मिरे — Navneet Vatsal Sahil
तुझ को देखना हम-आग़ोश न कर लें वो तू यूँँ न जी शीशों का ललचाया कर — Navneet Vatsal Sahil
इस दिल को गोकुल धाम किए है इक राधा मुझ को श्याम किए है — Navneet Vatsal Sahil
बस इक तेरे होने से घर बनता है कहने को तो सबकी हिस्सेदारी है — Navneet Vatsal Sahil
कितना सन्नाटा होगा उस के भीतर मैं ने हरदम हँसता देखा है उस को — Navneet Vatsal Sahil
होंठों पर ख़ामोशी रखने वालों की इन आँखों में ग़म का दरिया पलता है — Navneet Vatsal Sahil
बेहोशी के आलम अब तक तारी हैं हम ने उस पर इतनी साँसे वारी हैं — Navneet Vatsal Sahil

Nazm

हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं — Navneet Vatsal Sahil
"दिल नहीं तोड़ोगी" तुम तो घर बसा लोगी साथ किसी के पर देखो मैं तन्हा रह जाऊँगा देखो रुक जाओ न जाओ मान भी जाओ कह देता हूँ मैं कुछ कर जाऊँगा जाने को तो चली जाओगी पर कह देता हूँ साथ तुम्हारे मेरी सारी ख़ुशियाँ जाएँगी ये रुत ये बहारें फिर मुझ को ना भाएँगी बरसातें भी गुज़रेंगी बस तन पर मेरी ये रूह भिगा ना पाएँगी आख़िर एक ख़ुशबाश रूह का तुम क़त्ल कर जाओगी मेरे बिन तुम भी जान भला फिर कैसे रह पाओगी याद करो कहा था तुम ने साथ नहीं छोड़ोगी चाहे कुछ भी हो जाए पर दिल नहीं तोड़ोगी फिर क्यूँँ ऐसी बातें करती हो मान भी जाओ कह दो ना जान मेरी मुँह नहीं मोड़ोगी तुम मेरा दिल नहीं तोड़ोगी — Navneet Vatsal Sahil
"आख़िरी सर्दी" सब तबाह-ओ-बर्बाद हो जाएगा ये सितम है कि इक दिन कोई तुम पर मरते-मरते मर जाएगा तुम से था वो जो सुरख़ाब चेहरा कि जिस पे तुम मरती थीं बेनूर हो जाएगा मेंरे चश्मों को बीनाई जो तुम ने की थी अता उस को देखना नमी लग जाएगी ज़ंग खा जाएगा एक दिल जिस को बरसों धड़काया तुम ने बेचैन-ओ-बेक़रार रखा वो भी जान क़रार पा जाएगा साँसें जो महकती रहीं हैं अभी तलक सो उन को भी सीने का एक ज़ख़्म खा जाएगा जिस जिस्म को गर्मी-ए-आग़ोश में कितनी सर्दियां तुम ने रखा था इस सर्दी शायद सर्द हो जाएगा असर खो जाएगा और आख़िरश एक लड़का जिस से तुम को निस्बत थी जिस को तुम से निस्बत है हिज़्र तुम्हारा खा जाएगा मर जाएगा एक लड़का बिछड़ कर तुम सेे इस सर्दी सुनो मुझ को ऐसा लगता है मर जाएगा — Navneet Vatsal Sahil
"तुम कब आओगी" कितने दिन गुज़रे तुम्हें गए हुए तुम ने मुड़कर देखे हुए न कोई ख़त न कोई ख़बर ही भेजी तुम ने तुम जानती हो? तुम्हारे बा'द क्या हुआ वो बिल्लियां जो तुम्हारे होते हुए कोसों दूर रहती थी मेरे आस-पास घूमने लगी हैं कौए जो घर के ऊपर से गुज़रते तक न थे मुंडेर पर बैठे रहते हैं जाले जो तुम ने हटाये थे कभी मकड़ियों ने फिर से बना लिए हैं सारे घर में एक पेड़ जो सहन में तुम लगाकर गई थी दम तोड़ रहा है उसे पानी देने वाला कोई भी तो नहीं कुछ ख़बर भेजो अपनी "घर कब आओगी?" मैं थक चुका हूँ इन बिल्लियों, कौओ को भगाता हुआ जालों को हटाता पेड़ को बचाता हुआ एक दिया जो मुंतज़िर है बुझने को है इस की साँसों का तो इंतज़ाम भेजो झूठा सही इक पैग़ाम भेजो कि "तुम आओगी, तुम ज़रूर आओगी" — Navneet Vatsal Sahil
"हिज्र मनाने क्यूँँ नहीं देते" जानाँ ये मेरे आस-पास जमा ख़ुशनुमाँ लोग तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँँ नहीं देते ये मुझे रोने क्यूँँ नहीं देते? गर सीने में दर्द हो तो रोना ज़ब्त क्यूँँ हो? इन्हें तो मालूम ही नहीं रोते क्यूँँ है दर्द कैसा होता है जीते-जी मौत क्या होती है तुम तो जानती हो जानाँ आओ और इन्हें बतलाओ ये मेरे आस-पास जमा ख़ुशनुमां लोग तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँँ नहीं देते ये मुझे रोने क्यूँँ नहीं देते? गर रोना ज़ब्त है चश्मा नम क्यूँँ बनाया गया? इन लोगों को भी तो कभी आता होगा रोना फिर मुझे क्यूँँ रोकते हैं? तुम्हीं बतलाओ जानाँ जिस का दिल मर चुका हो दुनियां नज़रो के सामने राख़ हो जाए वो जो अपनी हालत पर ग़ौर करने से डरता हो लोगों के कह-कहों से सहम जाता हो जिस के सीने में दर्द ठहरा हो जो पलकें झपकने से भी डरता हो जिस की आँखों में अब मौत ख़्वाब बनकर रहती हो शीशों से भी खौफ़ खाने लगे क्या करे...गर आँसू आने लगें? तुम तो जानती हो जानाँ आओ और इन्हें बतलाओ इन्हें बतलाओ कि क्यूँँ नाला-ए-दर्द गले में ख़राशें न डाले? चीख-चीख कर कोई क्यूँँ सीने में दरारें ना डाले? आँसुओं के ज़ोर से चश्में चटखा ना डाले? मैं रोता हूँ... हाँ क्यूँँकि मेरे आब दीदा हैं इन में इतना पानी है कि सब कुछ बहा सकता हूँ फिर क्यूँँ ये दर्द नहीं बहा सकता? तुम्हारा हिज़्र नहीं मना सकता? तुम तो जानती हो जानाँ आओ और इन्हें बतलाओ ये मेरे आस-पास जमा ख़ुशनुमां लोग तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँँ नहीं देते ये मुझे रोने क्यूँँ नहीं देते? — Navneet Vatsal Sahil
"छुटे हुए पुरुष" प्रेम में छुटे हुए कुछ पुरुष पुरुष नहीं रहते वो हो जाते हैं स्त्री वो ख़ुद को भर लेते हैं भावुकता और आँसू से प्रेम में छुटे पुरुष प्राप्त कर कर लेते स्त्रीत्व के उस गुण को जिस में होता है मीरा सा पागलपन राधा सा निःस्वार्थ प्रेम वो चुनते हैं मीरा या राधा हो जाना या हो जाना दोनों ही दोनों हो जाना अत्यधिक दुःखद है उसे सहन करनी होती हैं तब दोनों ही पीड़ा राधा जिस के बगैर कृष्ण नाम अधूरा है परन्तु फिर भी राधा के हिस्से आता है वियोगी जीवन और वो चुन लेती है कृष्ण की यादों के साथ जीवन निर्वाह मीरा जिस के बगैर कृष्ण कोई भगवान नहीं और मीरा को मिलता है तिरस्कृत जीवन और अंतिम स्वांस तक वो चुनती है कृष्ण भक्ति दोनों ही अनंत प्रेम की पर्याय हैं जो बताता है अथाह या निःस्वार्थ प्रेम सदैव एक तरफ़ा रहा है वो नहीं प्राप्त कर पाता रुक्मणि होना राधा की भाँति मीरा ने नहीं स्वीकार किया प्रेमिका बने रहना और उस ने कृष्ण को पति कहा राधा हो जाना दुःखद तो है मीरा हो जाना अत्यंत दुःखद मैं भी तुम्हारे प्रेम में छूटा एक पुरुष हूँ — Navneet Vatsal Sahil
"इक जादुई लफ़्ज़" ना आप था ना तुम था ना तू था कभी नाम नहीं लिए हम ने एक दूसरे के फिर भी कितनी बातें होतीं थीं इक लफ़्ज़ था लफ़्ज़ क्या था जान जान और जान था ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था इस में वो सब कुछ था जो हमें एक दूसरे से चाहिए था इस में वो सारे वाइदे थे जो लोग मिलते वक़्त करते हैं वो सारी क़स में थीं जो बिछड़ते वक़्त के लिए थीं ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था जानते हो दोस्त ये लफ़्ज़ महज़ क़स में-ओ-वायदे ही ना था एक वाकया था पूरा हमारी मोहब्बत का ये इक ऐसा लफ़्ज़ था जिस में सांसें थीं जो अकेला सारे ठंडे लफ़्ज़ों के बीच गर्म था ज़िन्दा लफ़्ज़ था इक वही तो गवाह था हम मोहब्बत में कितने सच्चे थे एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे बोलते हुए अपना बदन ख़ुश्बूओं की क़बा लगती पेड़ नाचते लगते और हवा बहकती लगती ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था एक ऐसा लफ़्ज़ जिस का सुकून बोलने से ज़्यादा सुनने में आता कानों में मिश्री घोलती उस की आवाज़ के साथ जब ये लफ़्ज़ मिलता बदन सर-सरा उठता कलियाँ ख़ुद ही भँवरो से बोसे लेने को मचल उठतीं लगता मानो ज़िन्दगी दूर तलक सिर्फ़ छाँव है मानो सारी काइ‌नात सिर्फ़ मुझ पर मेहरबान थी अब ऐसे आलम में कभी जान ना पाया ये छाँव सिर्फ़ मुझ पर मेहमान थी पर ये लफ़्ज़ हैराँ हूँ अभी तलक सुनाई देता है — Navneet Vatsal Sahil